उत्तराखंड के नए राज्यपाल के बारे में जानें...
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मेघालय के राज्यपाल कृष्ण कांत पॉल उत्तराखंड के नए राज्यपाल नियुक्त किए गए हैं। पॉल सेवानिवृत्त आईपीएस हैं और दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त रह चुके हैं। यूपीए सरकार ने अगस्त 2013 में उन्हें राज्यपाल बनाया था।
पॉल पर उत्तराखंड के साथ मणिपुर का भी अतिरिक्त भार रहेगा जबकि मेघालय का जिम्मा पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी को सौंपा गया है। पॉल का जन्म छह फरवरी 1948 को हुआ था।
पॉल को सरकार में शीर्ष स्तर पर प्रशासन, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा खुफिया में 42 साल का अनुभव है। इस दौरान पॉल ने उत्कृष्ट ढंग से बहुत ही संवेदनशील और महत्वपूर्ण कार्य संभाले हैं।
मेडलः
1. विशेष सेवा पदक (अंडमान और निकोबार)
2. सराहनीय सेवाओं के लिए पुलिस पदक
3. विशिष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक
4. विशेष सेवा पदक (बार) अरूणाचल
5. आंतरिक सुरक्षा मेडल
लाटसाहब के हुक्म के सामने नहीं टिके कानून
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
अपने कार्यकाल में विवादित सुर्खियों से घिरे रहे महामहिम राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी साल खत्म होने से पहले ही विदा हुए। अपनी बात मनवाने के लिए सरकार पर दबाव डालने का हुनर उन्हें खूब आता था। नौकरशाही के एक गुट को प्रश्रय देने का मामला हो या फिर अपनी मर्जी की बात मनवानी हो, कुरैशी ने कभी विवादों की परवाह नहीं की।
यहां तक कि कानूनों का उल्लंघन करते हुए डीएम देहरादून से बगैर पुलिस केसत्यापन के ही 12 बोर की राईफल का शस्त्र लाइसेंस बनवाया।
पंतनगर विवि अधिनियम में यह प्रावधान है कि कुलपति पद पर राज्यपाल किसी को यदि दो बार से ज्यादा छह छह महीने का विस्तार देते हैं और स्थाई कुलपति की नियुक्ति नहीं कर पाते तो फिर उनकी कुलपति नियुक्त करने की शक्ति शासन में निहित हो जाती है।
इसके बाद राज्य सरकार बगैर राज्यपाल की अनुमति के ही नया कुलपति नियुक्त करती है। मगर, पंतनगर विवि में छह छह महीने के लिए राज्यपाल अजीज कुरैशी ने छह कुलपति नियुक्त किए। लेकिन सरकार कुछ नहीं कर सकी।
कुछ ऐसी सिफारिश भी कुरैशी ने की जिन्हें सरकार ने अनैतिक मानते हुए रिजेक्ट किया। एक ऐसे कुलपति को बगैर सर्च कमेटी केही पांच साल का कार्यकाल बढ़ाने का आदेश कर दिया था, जब अफसरों ने बताया कि एक्ट में यह प्रावधान नहीं है तो यही जवाब मिला कि एक्ट बदल दो।
हालांकि यह काम नहीं हो सका। कुलपति चयन प्रक्रिया में ऐसे विद्वान लोगो के नाम खारिज किए जिन्हें राष्ट्रपति ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों का कुलपति नियुक्त किया।
आर्म्स एक्ट के प्रावधानों और केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा निर्देशों को हाशिए पर डालते हुए राज्यपाल के पद का दुरुपयोग किया और सितम्बर 2013 में तत्कालीन जिलाधिकारी देहरादून से बगैर पुलिस सत्यापन के ही 12 बोर की राईफल का लाइसेंस बनवाया। वह भी अखिल भारतीय क्षेत्र का।
शस्त्र लाईसेंस के लिए आर्म्स एक्ट में उम्र सीमा तय तो नहीं लेकिन एक उम्र के बाद फिजिकल फिटनेस का प्रमाण पत्र देना होता है। लाईसेंस जारी करने वाली अथॉरिटी को यह सुनिश्चित करना होता है कि शस्त्र धारण करने वाला व्यक्ति फिजिकली फिट भी है या नहीं।
दिसम्बर 2011 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को आदेश जारी किया कि जिला मजिस्ट्रेट बगैर पुलिस की सत्यापन के किसी भी व्यक्ति को शस्त्र लाईसेंस जारी नहीं करेंगे।
नियुक्तियों में भी रहा दखल
राज्यपाल कुरैशी के दबाव में ही छाया शुक्ला को लोक सेवा आयोग का सदस्य बनाना पड़ा। छाया शुक्ला पंतनगर विवि में सहायक प्रोफेसर थी। संविधान की अवहेलना कर विवि से अवकाश दिलवाकर आयोग में नियुक्ति कराई गई।
उस समय तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा ने राज्यपाल से कोई दूसरा नाम देने का आग्रह भी किया था लेकिन कुरैशी ने नहीं सुनी और छाया शुक्ला को ही सदस्य बनाना पड़ा।
डी.सेंथिल पांडियन को हरिद्वार का डीएम बनवाने के पीछे भी राजभवन का ही दबाव था। तभी पांडियन दूसरी बार हरिद्वार के कलक्टर बने। इसके अलावा एक सेवा निवृत आईएएस की फाइल खारिज कर हेमलता ढौंडियाल को मानवाधिकार आयोग में सदस्य बनवाया।
इसके बाद सेवा निवृत आईएएस अरुण ढौंडियाल को नियम कानूनों के विपरीत जाकर सचिव ही नहीं बनवाया अलावा इसके उन्हें प्रमुख सचिव बनाने के लिए भी आदेश दिया। लेकिन शासन ने बात नहीं मानी। निधि पांडे को राजभवन के दबाव में ही राज्यपाल की प्रभारी सचिव बनाया गया।