दो राज्यों के मुख्यमंत्री बनने वाले इकलौते नेता थे एनडी तिवारी, पढ़िए उनसे जुड़ी 10 अनकही बातें...
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स्व. नारायण दत्त तिवारी ही एक ऐसे इकलौते नेता थे जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस ही नहीं अन्य पार्टियों के नेता भी उन्हें बेहद पसंद किया करते थे। आइए जानते हैं उनसे जुड़ी 10 अनकही बातें...
पूर्व दर्जा राज्यमंत्री डॉ. गणेश उपाध्याय के मुताबिक वर्ष 1993-94 में राज्य आंदोलन के दौरान जब वह कुमाऊं विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष थे। तब राज्य आंदोलनकारियों का शिष्टमंडल तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री राजेश पायलट से वार्ता के लिए दिल्ली गया था। वार्ता दो दौर में होनी थी। पहले दौर की वार्ता हो चुकी थी। दूसरे दौर की वार्ता अगले दिन होनी थी।
उन्होंने बताया कि पहले दौर की वार्ता के बाद जब वह लोग पास में घूम रहे थे तो उन्हें पास में ही तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल विहारी वाजपेयी का आवास नजर आया। वह अपने साथी केदार पलड़िया आदि को लेकर वाजपेयी से मिलने चल दिए। उपाध्याय ने बताया कि वाजपेयी को जब यह पता चला कि नैनीताल से आए कुछ लोग उनसे मिलने आए हैं तो उन्होंने बुला लिया।
बकौल डा. उपाध्याय कुशल क्षेम पूछने के बाद वाजपेयी ने सबसे पहले उनसे पूछा कि तुमने वर्ष 1991 में एनडी तिवारी को क्यों हरा दिया? उन्होंने बताया कि इसका हमारे पास कोई जवाब नहीं था। उपाध्याय ने बताया कि जब उन्होंने वाजपेयी से पूछा कि क्या चुनाव जीतने के बाद पीवी नरसिंहाराव अपनी केबिनेट में एनडी को जगह दे देते इस पर वाजपेयी का जवाब था कि एक म्यान में दो तलवारें कैसे रह सकती हैं। उपाध्याय का कहना है कि वर्ष 1991 में एनडी तिवारी के लोकसभा चुनाव हारने की टीस वाजपेयी के मन में भी थी।
एनडी के नाम पर हो कुमाऊं विवि का नाम
पूर्व दर्जा राज्य मंत्री डा. गणेश उपाध्याय ने कुमाऊं विश्वविद्यालय का नामकरण पंडित नारायण दत्त तिवारी के नाम से कराने की मांग की है। डा. उपाध्याय ने कहा है कि जिस तरह से गढ़वाल विवि का नाम हेमवती नंदन बहुगुणा विवि है उसी तरह कुविवि का नाम सरकार पंडित नारायण दत्त तिवारी के नाम पर करे, यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
नैनीताल को कुमाऊं विवि की सौगात तिवारी की देन
कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना, नैनीताल को रोपवे और नैनी झील की सेहत सुधारने को 100 करोड़ रुपये केंद्र सरकार से दिलवाना पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की विशेष उपलब्धि है। कुमाऊं और खासकर नैनीताल जिले के पर्वतीय क्षेत्र, तराई-भाबर में उद्योगों और सड़कों का जाल बिछाने में तिवारी की ऐतिहासिक भूमिका रही है। यहां तक कहा जाता है कि अगर तिवारी जी नहीं होते तो नैनीताल में रोपवे और कुमाऊं विवि नहीं होता।
80 के दशक की शुरुआत तक कुमाऊं और गढ़वाल के सभी महाविद्यालय आगरा विश्वविद्यालय के अधीन थे। छोटे-बड़े काम के लिए विद्यार्थियों-अध्यापकों को आगरा की दौड़ लगानी पड़ती थी। इसके चलते उत्तराखंड में विश्वविद्यालय स्थापना की मांग को लेकर आंदोलन चला। 1973 में सरकार ने उत्तराखंड के लिए पृथक विवि स्थापना का निर्णय लिया। तब यूपी के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा और तिवारी वित्त मंत्री थे। सरकार ने कुमाऊं/गढ़वाल विवि नाम से प्रथम विवि का मन बनाया था, लेकिन मुख्यालय को लेकर विवाद था। तिवारी ने अपने प्रभाव से एक ही साथ दो विश्वविद्यालय बनवाने में सफलता पाई और गढ़वाल और कुमाऊं में दो विवि बने।
23 नवंबर 1973 को कुमाऊं विवि की स्थापना हुई। तब यहां मात्र डिग्री कॉलेज के कोई भी अन्य भवन, संसाधन नहीं थे। अधिकतर विभागों में प्रोफेसर तक नहीं थे। तिवारी ने अच्छा-खासा बजट दिलाकर विवि के प्रशासनिक भवन, नए भूगर्भ विज्ञान विभाग आदि के भवन बनवाए। प्रोफेसर के पद सृजित करवाए। लोक निर्माण विभाग गेस्ट हाउस को छात्रावास के लिए विवि को हस्तांतरित करवाया। स्थापना के मात्र दस वर्ष बाद डीएसबी परिसर के कला विभाग का विशाल भवन जलकर खाक हो गया। तब इसके लिए राशि भी तिवारी ने उपलब्ध करवाई। विवि के प्रशासनिक भवन, कला विभाग के नवनिर्मित विभाग व जियोलॉजी विभाग आदि के उद्घाटन के शिलापटों पर तिवारी के योगदान की गाथा लिखी है।
उत्तराखंड में मुख्यमंत्री रहने के दौरान विवि में इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की शिक्षा प्रारंभ करवाने को तिवारी बहुत प्रयासरत थे। उन्हीं के प्रयासों से हरमिटेज का विशाल भवन विवि को मिला और उनके सुझाव पर इसे भव्य हेरिटेज स्वरूप दिया गया। माइक्रोसॉफ्ट के सहयोग से आईटी शिक्षण प्रारंभ करवाने तब वह स्वयं यहां आए थे। 1983 में ही तिवारी के प्रयासों से नैनीताल में रोपवे की स्थापना हुई थी। तब विभिन्न वर्गों की ओर से इसका विरोध भी हुआ था। तिवारी ने लोगों को आश्वस्त किया था कि इसके लिए वह विदेशों से ऐसी तकनीक लाएंगे कि यह पहाड़ी कमजोर होने के बजाय नेलिंग तकनीक से और भी सुदृढ़ हो जाएगी। आज रोपवे नैनीताल का बेहतरीन आकर्षण और केएनवीएन का सर्वाधिक कमाई का जरिया है। 2002 में जब वह उत्तराखंड के सीएम थे तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नैनीताल आए थे। वह वाजपेयी को रिसीव करने बरेली गए थे। जहां से उनके साथ ही हेलीकाप्टर में नैनीताल आए। तिवारी ने वाजपेयी को तब मृतप्राय हो चुकी नैनी झील की दुर्दशा से अवगत कराते हुए इसे संरक्षण के लिए लगभग 100 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया था। उसी राशि से झील का स्वरूप सुधरा और इसे नवजीवन मिला।
वाकई वह नो डिले तिवारी थे
उन्हीं की देखरेख में पूरे प्रोजेक्ट का निर्माण हुआ था। पावर चैनल के लिए वन विभाग की भूमि हस्तांतरण में दिक्कत आ रही थी। तिवारी तब यूपी के मुख्यमंत्री थे। उनसे संपर्क करने राव और तत्कालीन अभियंता (डिप्टी मैनेजर) स्व. पीसी जोशी (जो एनएचपीसी के भूमि हस्तांतरण मामले देख रहे थे) के साथ लखनऊ पहुंचे थे। उनसे वन विभाग की सुस्त कार्यशैली के बारे में बताया गया तो तिवारी जी ने वन सचिव को बुलाया और बनबसा, टनकपुर की वन भूमि एनएचपीसी के नाम शीघ्र हस्तांतरित करने को कहा।
राव बताते थे कि सचिवालय को जाते समय तिवारी जी ने वन सचिव के सामने ही उनसे कहा कि राव साहब सचिवालय से लौटने के बाद आप दोनों लंच उनके साथ करेंगे। सचिवालय में भूमि हस्तांतरण फाइल बनने के बाद जब राव ने अभियंता स्व. जोशी से कहा कि सीएम साहब लंच की बात कर रहे थे तो स्व. जोशी ने कहा कि सर वह तो सीएम साहब का वन सचिव को इशारा था कि लंच तक काम हो जाना चाहिए।
एचएन बहुगुणा की तरह एनडी को भी मिले सम्मान
गढ़वाल और कुमाऊं विवि की स्थापना एचएन बहुगुणा और एनडी तिवारी के कारण ही संभव हुई थी। बहुगुणा की मृत्यु के बाद गढ़वाल विवि का नाम उनके नाम पर रखा गया। उसी तर्ज पर कुमाऊं विवि का नाम तिवारी के नाम पर रखा जाना उनके योगदान को सार्थक करने के समान होगा। आगामी 14 नवंबर को नैनीताल में कुविवि दीक्षांत समारोह होना है, जिसमें राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी उपस्थित रहेंगे। यह उचित अवसर होगा जब इस आशय की घोषणा की जाए।
पत्रकारों की मांग पर दुबारा किया तहसील का उद्घाटन
बनबसा निवासी जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष बहादुर सिंह पाटनी बताते हैं कि उत्तराखंड के सीएम रहते हुए जब तिवारी जी ने टनकपुर को तहसील की सौगात भेंट की तो उद्घाटन अवसर पर छोटे-बड़े नेताओं ने उन्हें चारों ओर से ऐसे घेर लिया कि मीडिया कर्मी फोटो ही नहीं ले सके। डरते-डरते एक पत्रकार ने उनसे कहा कि सर उद्घाटन दोबारा कर दीजिए तो वह मुस्करा दिए। बड़े ही सहजभाव से पत्रकारों की मांग पर दोबारा उद्घाटन करने को तैयार हुए थे। तब कहीं पत्रकारों को टनकपुर तहसील के उद्घाटन की फोटो मिल सकी थी।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहते हुए जब वह बनबसा एनएचपीसी आए थे तो पावर हाउस के निरीक्षण के वक्त पत्रकारों ने अघोषित विद्युत कटौती का मामला उठाया। इस पर तिवारी ने मुख्य अभियंता को फोन लगवाकर कटौती बंद करने के निर्देश दे दिए थे। वर्ष 1991 में जब वह नैनीताल से सांसद का चुनाव लड़ रहे थे तब वह बनबसा पहुंचे। उनके प्रतिद्वंद्वी भाजपा के बलराज पासी बनबसा रेलवे चौक बाजार में भाषण दे रहे थे। तभी स्व. तिवारी वहां उनकी (बहादुर सिंह पाटनी) की खुली जीप में पहुंचे। उन्होंने जीप रुकवाकर करीब पांच से सात मिनट तक जीप में खड़े खड़े ही पासी का भाषण सुना था।
हरिदत्त कांडपाल से था बड़ा लगाव
कैड़ा को दिलाई थी छात्रसंघ अध्यक्ष पद की शपथ
विकास पुरुष एनडी तिवारी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। भीमताल के विधायक राम सिंह कैड़ा वर्ष 1999 में जब एमबीपीजी कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे तब एनडी तिवारी ही उन्हें छात्रसंघ अध्यक्ष पद की शपथ दिलाने पहुंचे थे। कैड़ा ने बताया कि वह शुरू से ही एनडी को बूबू कहकर पुकारते थे। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एनडी ने उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा कि राजनीति में तुम अच्छा मुकाम पाओगे। कैड़ा ने बताया कि उसके बाद वह कई बार उनके कैड़ागांव (देवीधूरा) स्थित घर में भी आए थे। भीमताल के लोग एनडी तिवारी को कभी नहीं भुला सकते हैं।
कपकोट आंदोलन को अपने अंदाज में शांत कराया था एनडी ने
कपकोट (बागेश्वर) में तहसील मुख्यालय की स्थापना को लेकर वर्ष 2004 में कपकोट में आंदोलन चल रहा था। कुछ ग्रामीण ब्लाक मुख्यालय में तहसील की स्थापना चाह रहे थे तो कुछ कपकोट ग्राम पंचायत की जमीन में मुख्यालय बनाने की मांग को लेकर आंदोलनरत थे। यह विवाद जब तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के पास पहुंचा तो उन्होंने प्रतिक्रिया देने की बजाय एक ही लाइन कही कि धीरज धरो, मडु फोकियोल आफी देखियोल। राजनीति की गूढ़ भाषा बोलने वाले एनडी तिवारी की इस लाइन को पहले तो लोग समझ नहीं सके। लेकिन जब उनके फैसले की बारी आई तो पता चला कि उन्होंने तहसील मुख्यालय कपकोट में बनाने का आदेश दिया है।
कपकोट के तत्कालीन प्रधान गणेश चंद्र उपाध्याय बताते हैं कि एनडी तिवारी के कार्यकाल के दौरान वह कपकोट के प्रधान थे। कपकोट तहसील मुख्यालय के भवन निर्माण के लिए धन आवंटित होते ही भूमि चयन को लेकर विवाद खड़ा हो गया। दोनों पक्षों के लोग आंदोलन कर रहे थे। तत्कालीन केबिनेट मंत्री राम प्रसाद टम्टा के माध्यम से बात सीएम एनडी तिवारी तक पहुंची। एनडी तिवारी ने डीएम एल फेनई को आदेश दिया कि वह कपकोट जाकर प्रधान से वार्ता करें। इसके बाद डीएम ने ग्रामीणों से वार्ता कर मामला सुलझाया। तत्कालीन एसडीएम मोहन सिंह बनकोटी, तहसीलदार उदय सिंह राणा, पटवारी मोहन राम आर्य ने कपकोट में किसानों की भूमि अधिग्रहीत कर तहसील मुख्यालय के निर्माण का रास्ता साफ किया। मात्र तीन दिन के भीतर अनापत्ति लेकर किसानों को मुआवजा वितरित कर दिया था। कपकोट के ग्रामीण आज भी एनडी तिवारी के रणनीतिक कुशलता के कायल हैं।
विरोधियों के लिए भी नरम थे तिवारी जी
मुझे आज भी याद है वो 30 मार्च 1984 का दिन जब केंद्र में उद्योग मंत्री रहते हुए नारायण दत्त तिवारी ने मेहरागांव के खुटानी स्थित मेरे लोक सांस्कृतिक संग्रहालय का उद्घाटन किया था। पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल यह बताते हुए जोड़ते हैं, पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी सभी दलों के लोगों के लिए नरम व्यक्तित्व के इनसान थे। तिवारी के निधन से उनको बहुत आघात लगा। अपने जन्म की 93वीं वर्षगांठ पर पूर्व सीएम अपने पीछे लाखों चाहने वालों को रोता हुआ छोड़ गए।
डॉ. मठपाल ने बताया कि 29 मार्च 1984 को केंद्र में उद्योग मंत्री रहते हुए एनडी तिवारी अपने द्वारा स्थापित भीमताल औद्योगिक घाटी के फ्यूजी फिल्म के उद्घाटन समारोह में पहुंचे थे। इसके बाद वह लोक सांस्कृतिक संग्रहालय में पहुंचे और उनके संग्रहालय का उद्घाटन पुजारी स्व. चंद्र बल्लभ पांडे ने कराया था, जहां एनडी तिवारी ने लोक संग्रहालय का निरीक्षण कर चित्रों को देखने के बाद डॉ. मठपाल को सम्मानित किया था। 1984 में एनडी तिवारी ने केंद्रीय उद्योग मंत्री रहते हुए उन्हें पत्र लिखा था जो आज भी उनके पास है।
संघ का होने के बाद भी बनाया कला परिषद का उपाध्यक्ष
पद्मश्री मठपाल ने बताया कि वह संघ से जुड़े हुए थे। इसके बावजूद एनडी तिवारी ने 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रहते हुए मुझे उत्तराखंड संस्कृति साहित्य एवं कला परिषद का उपाध्यक्ष बनाया था, जिसका कांग्रेसियों ने विरोध किया था। मेरे आग्रह पर ही उन्होंने कला परिषद का सालाना बजट डेढ़ करोड़ से 2.50 करोड़ किया था। साथ ही वर्ष 2004 में उनके द्वारा प्रदेश भर के 39 साहित्यकारों का सम्मान किया था।
किलमौड़ और हिसाउ खाने के थे शौकीन
पद्मश्री मठपाल ने बताया कि एनडी तिवारी 1955 में मेहरागांव के पढालनी गांव स्थित उनके ससुर स्व. पुरुषोत्तम पढालनी के घर जाया करते थे और मेरी पत्नी सुशीला मठपाल को वह बहन मानते थे। पढालनी गांव में पहुंचकर कहते थे ‘हिट सुशीला गिज्ज काउं करुंलू’ मतलब चल सुशीला किलमौड़ खाकर होठों को काले कर आते हैं, जो वाक्य आज भी उन्हें याद है।
पदमपुरी से सात किमी दूर धारी पैदल पढ़ने जाते थे एनडी
तिवारी के साथी रहे बच्ची राम आर्य ने बताया कि एनडी की प्राथमिक शिक्षा धारी के अपर प्राइमरी स्कूल में वर्ष 1930 में शुरू हुई थी। उस समय सड़क नहीं थी। एनडी जंगलों के रास्ते से सात किमी पैदल चलकर पदमपुरी से धारी के प्राइमरी स्कूल में पढ़ने जाते थे। उस समय मात्र धारी, मुक्तेश्वर और सरगाखेत में ही प्राइमरी स्कूल थे।
बच्ची राम ने बताया कि जब वह धानाचूली में पहली कक्षा में पढ़ते थे तब एनडी तिवारी धारी में चौथी क क्षा में पढ़ते थे। इसके बाद एनडी ने 1936 में 11 वर्ष की उम्र में सीआरएसटी में दाखिला लिया।
तिवारी बचपन से ही तेज बुद्धि के थे
उन्होंने एनडी की अगुवाई में धारी के डाक बंगले से अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया था। जगह-जगह तोड़फोड़ करने पर 1942 में एनडी तिवारी और उनके साथियों को नैनीताल जेल में बंद होना पड़ा था। बताया कि एनडी तिवारी ने आगे की शिक्षा के लिए अपने स्वतंत्रता आंदोलन में साथी रहे स्व. जोध सिंह से पांच रुपये उधार लेकर घर से भागने की योजना बनाई। इसके चलते वह आगे की पढ़ाई के लिए प्रयागराज (इलाहाबाद) चले गए, जहां उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर आगे की शिक्षा हासिल की।
पदमपुरी में सोमवारी बाबा से लिया था आशीर्वाद
पूर्व सीएम एनडी तिवारी 21 अक्तूबर 2015 को अपने पैतृक गांव पदमपुरी अपनी पत्नी उज्जवला तिवारी और पुत्र रोहित शेखर के साथ पहुंचे थे। यहां उन्होंने सोमवारी बाबा के आश्रम जाकर पूजा-अर्चना की थी। उन्होंने अपने चचेरे भाई दुर्गा दत्त तिवारी के परिजनों से भी मुलाकात की थी।
इस दौरान एनडी तिवारी और उनके परिजन अपनों को देख के भावुक हो उठे थे। साथ ही हल्द्वानी से पदमपुरी तक लोगों ने उनका बैंड बाजों के साथ स्वागत किया था। उन्होंने अपने साथियों और बुजुर्गों से भेंट की थी। इससे पहले एनडी तिवारी 2004 में पदमपुरी आए थे और सोमवारी बाबा का आशीर्वाद लिया था।