पच्चीस लाख के मकान गंवाकर मदद में मिले सिर्फ तीन लाख
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आपदा के जख्म कितने गहरे होते हैं यह बस्तड़ी में देखा जा सकता है। इस गांव में वर्ष 2016 में 30 जून की रात भीषण आपदा आई थी। इसमें सात मकान पूरी तरह और 23 मकान आंशिक रूप से नष्ट हो गए थे। इनमें कई मकान ऐसे थे, जिनकी लागत 25 लाख से अधिक थी।
इन मकानों को खतरनाक घोषित करते हुए इसमें रहने वालों को प्रशासन आपदा शिविरों में ले आया। सरकार ने आपदा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने की जो कोशिश की वह मजाक बनकर रह गई। हर परिवार को मकान बनाने के लिए सिर्फ तीन लाख रुपये थमाए गए।
इस राशि से मकान की छत पड़ना भी कठिन हो गया है। दो कमरों, एक रसोई, एक शौचालय का निर्माण कर रहे लोगों को अपनी जेब से पांच से दस लाख रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं, जिनके पास ऐसे आर्थिक साधन नहीं हैं, उनके मकान अधूरे हैं।
जानिए, क्या कहते हैं आपदा पीड़ित
बस्तड़ी निवासी आपदा पीड़ित मोहन चंद्र भट्ट का कहना है कि जैसे-तैसे मकान की छत तो डाल दी लेकिन दरवाजे की लकड़ी, कमरों की फिनिशिंग के लिए पैसा नहीं है। उनका मकान तीन लाख खर्च होने के बाद भी अधूरा है। बस्तड़ी के जिन लोगों को मकान बनाने के लिए राशि मिली, उनमें से 16 लोगों ने मकानों के निर्माण का काम शुरू कर दिया है।
तीन परिवारों को मकान बनाने के लिए जमीन नहीं मिल पाई है। इस कारण उनकी राशि अटकी है। बस्तड़ी की आपदा ने सभी को एक श्रेणी में लाकर रख दिया। सरकार की नीतियों से लोगों के अंदर भारी गुस्सा है। उनका सवाल है कि मकान के लिए तीन लाख रुपये की राशि किस मानक के अनुसार दी गई है। समाजसेवी शंकर भट्ट का कहना है कि कोई नेता और अधिकारी भी तीन लाख रुपये में मकान बनाकर तो दिखाएं।
पुराने मकानों की मरम्मत तक नहीं सोची
सरकार और प्रशासन की संवेदनहीनता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि उसने गांव खाली करने का आदेश तो दे दिया लेकिन आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त मकानों की मरम्मत के विकल्प पर गौर तक नहीं किया। कई मकान तो ऐसे हैं जो मरम्मत कर रहने लायक बनाए जा सकते हैं लेकिन सरकार ने इसका विकल्प ही नहीं दिया।
बस्तड़ी की आपदा के तुरंत बाद नेताओं और अधिकारियों के दौरे जरूर हुए लेकिन उसके बाद किसी ने भी गांव की तरफ पलटकर नहीं देखा। आपदा के बाद आमतौर पर जिस तरह का रवैया रहता आया है उसी को बस्तड़ी के लोग भी झेल रहे हैं। समाजसेवी शंकर भट्ट कहते हैं कि आपदा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सरकार अपनी नीति और मानकों को स्पष्ट करे।
बस्तड़ी के लोगों को 30 जून की आपदा बड़ा कष्ट दे गई है। लोगों की जमीन, घर, परिजन सब बिछुड़ गए। अब जो लोग आपदा से बच गए हैं वह जीवनभर कष्ट सहते रहना उनकी नियति बन गई है। उनके लिए न तो सरकारी मदद है और न प्रशासन की संवेदना।