बदहाली में जिंदगी गुजारने को मजबूर देश के वीर बहादुर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सरकार की तरफ से हर साल जान जोखिम में डालकर किसी की जान बचाने वाले बच्चे को वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।
इस सम्मान से बच्चे का मान तो बढ़ता है, लेकिन उसके परिवार के आर्थिक हालात में कोई बदलाव नहीं आ पाता है। अमर उजाला ने पिछले कुछ वर्षों में वीरता पुरस्कार से सम्मानित ऐसे ही बच्चों का जायजा लिया तो निराश करने वाली तस्वीर सामने आई। तकरीबन सभी वीर बहादुर बच्चों को सम्मान देने के बाद सरकार भूल चुकी है। सभी की जिंदगी और उनका परिवार जैसे-तैसे जीवन बसर कर रहा है।
साल 2009 में सातवीं में पढ़ने वाले प्रियांशु जोशी अपनी बहन को गुलदार से बचाया था। उसकी इस बहादुरी के लिए 26 जनवरी 2011 को दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था। इस समय प्रियांशु केंद्रीय विद्यालय आईएमए में 12वीं कक्षा में पढ़ रहा है।
वह अपनी बहन प्रियंका और सेना से सेवानिवृत्त पिता राजकुमार जोशी के साथ प्रेमनगर में एक किराये के कमरे में रहता है। वीरता पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद भी उसके आर्थिक हालात नहीं बदले हैं। प्रियांशु का कहना है कि वह 12वीं करने के बाद एनडीए में जाना चाहता है।
अमर उजाला टीम ने प्रियांशु जोशी का हाल जानने के लिए प्रेमनगर के विंग नंबर तीन स्थित उसके घर पहुंची। घर पर मिले प्रियांशु के पिता राजकुमार जोशी और बहन प्रियंका जोशी ने बताया कि प्रियांशु ट्यूशन पढ़ने गया है। पिता ने बताया कि पूरा परिवार टीन शेड के किराये के एक कमरे में रहता है।
बेटे की बहादुरी पर केंद्र सरकार ने सम्मानित किया था। उस दौरान पूछा गया था कि बेटे को वह किस स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं, तो उन्होंने दून स्कूल में पढ़ाने की इच्छा जताई थी, लेकिन यह सपना पूरा नहीं हुआ। राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार मिलने के बाद प्रियांशु की स्कूल फीस इंडियन काउंसिल फॉर चाइल्ड वेलफेयर की ओर से दी जाती है।
इसके अलावा परिवार को किसी तरह का आर्थिक सहयोग नहीं मिला। राजकुमार बेटी की पढ़ाई को लेकर भी चिंतित हैं। वह बताते हैं कि केंद्रीय विद्यालय आईएमए से इंटर पास करने के बाद वह प्राइवेट से बीए की पढ़ाई कर रही है। उनका कहना है कि वह बेटी को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने की वजह से वह कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
दोनों बच्चों की देखभाल कर रहे पिता
सेना से सेवानिवृत्त राजकुमार जोशी बताते हैं कि वह मूलरूप से कुमाऊं मंडल के लोहाघाट के रहने वाले हैं। करीब चार दशक पहले उनका परिवार दून आ गया था। लगभग दस साल पहले एक हादसे में उनकी पत्नी आराधना जोशी की मौत हो गई। तब से दोनों बच्चों की देखभाल वह अकेले करते आ रहे हैं। पेंशन से ही परिवार का खर्च चलता है।
तीन बच्चियों की परवरिश कर रही बहादुर बबली
अपनी जान पर खेलकर वर्ष 2004 में छह मासूम बच्चों की जान बचाने वाली इंदिरा बस्ती (लालपुल, ज्वालापुर) निवासी बहादुर बालिका बबली अब सयानी हो चुकी है। चार साल पहले उसकी शादी खतौली (यूपी) में हुई। अब वह अपनी तीन बेटियों की जिम्मेदारी से परवरिश कर रही है। लेकिन राष्ट्रपति पुरस्कार पाने के बाद सभी की लाडली बनी बबली के परिवार की सुध कोई नहीं ले रहा है। उसका परिवार तंगहाली में जी रहा है।
इंदिरा बस्ती निवासी शादी हुसैन की नौ संतानों में से आठवें नंबर की बबली उस समय करीब 14 साल की थी। एक जून 2004 की शाम को मोहल्ले के बच्चे गंगनहर के किनारे एक रेहडे़ पर खेल रहे थे तभी अनियंत्रित होकर रेहड़ा गंगनहर में जा गिरा। पास में खड़ी बबली ने जान की परवाह किए बिना गंगनहर में छलांग लगा दी और छह मासूमों को बाहर निकाला। बबली की बहादुरी की गूंज दिल्ली तक पहुंची। उसे राज्यपाल ने सम्मानित किया।
उसके बाद कई संस्थाओं ने भी सम्मानित किया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने बबली को वीरता पुरस्कार दिया। बबली का परिवार अब भी गंगनहर के किनारे छोटे से मकान में रह रहा है। उसके पिता शादी हुसैन और बहन साजिदा ने बताया कि बबली की चार साल पहले खतौली में शादी हो चुकी है।
सम्मान पाने के बाद बबली को सम्मान तो खूब मिला, लेकिन परिवार के हालात नहीं बदले। उसके एक भाई की कुछ समय पहले कैंसर से मौत हो चुकी है। भाई के इलाज के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी ने ढाई लाख रुपये दिए थे। उसके बाद सरकार ने मदद का भरोसा दिया था, लेकिन कई चक्कर काटने के बाद कुछ नहीं मिला।
बहन साजिदा ने बताया परिवार ने कर्ज लेकर 16 लाख रुपये इलाज पर खर्च किए, लेकिन भाई की जान नहीं बचा पाए। बबली की शादी के लिए भी सरकार के दरबार में बूढ़े पिता ने खूब चक्कर काटे, लेकिन एक पाई नहीं मिली। इस समय बबली के बुजुर्ग माता-पिता और भाई-बहन कांवड़ बनाकर और मजदूरी करके गुजर बसर कर रहे हैं।
दसवीं से आगे नहीं पढ़ पाया बहादुर हरीश
बारह साल पहले जब तिनवाल गांव के हरीश राणा को राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार मिला था, तो परिजनों को उसकी बेहतर भविष्य की उम्मीद जगी थी। लेकिन माली हालत में पले वीर बालक की किसी ने सुध नहीं ली। स्थिति यह रही कि वह 10वीं से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाया। परिवार के भरण-पोषण के लिए वह रोपवे में नौकरी कर रहा है।
प्रतापनगर ब्लॉक के भदूरा पट्टी के ग्राम तिनवाल गांव के स्व. बलवंत सिंह राणा और रुकमा देवी का 12 वर्षीय बेटा हरीश उस वक्त चर्चाओं में आया जब उसका नाम वीरता पुरस्कार के लिए चुना गया। बहादुर बालक ने वर्ष 2003 में घर के पास आए एक गुलदार के शौचालय में घुसने पर बंद कर दिया था।
उसकी इस बहादुरी के लिए उसे राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए चुना गया। दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम ने पुरस्कृत किया। राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने पर परिजनों को उसके बेहतर भविष्य की आस जगी थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। चार भाई-बहनों में सबसे छोटे हरीश का विवाह हो चुका है और उसकी एक साल की बच्ची है। हरीश कहता है कि सरकार से उसे कोई मदद नहीं मिली।
चयन पर अर्जुन के गांव में खुशी की लहर
भिलंगना ब्लॉक में ग्राम बडियार (मालगांव) के अर्जुन का राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए चयन होने पर उसके गांव और स्कूल में खुशी का माहौल है। जांबाज की मां विक्रमा देवी भी लाल को पुरस्कार मिलने की खुशी में आंसू नहीं रोक पाई।
हिंदाव पट्टी के ग्राम पंचायत बडियार में 16 जुलाई 2014 की रात को आंगन में आ धमके गुलदार ने विक्रमा देवी पर हमला किया था। मां की चीख-पुकार सुनते ही 16 वर्षीय अर्जुन ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए मां को किनारे खींच कर गुलदार पर दरांती से हमला कर भगा दिया था।
मौत के मुंह से बचकर आई मां को जब यह खबर मिली की अर्जुन का नाम वीरता पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है, तो वह खुशी से रो पड़ी। विक्रमा देवी कहती हैं कि चार भाई-बहनों में सबसे छोटे अर्जुन के पिता सोहन सिंह की मृत्यु 17 वर्ष पूर्व हो गई थी।
तब वह तीन माह का था। जीआईसी मथकुड़ीसैण में 12वीं में पढ़ रहे 17 वर्षीय अर्जुन का चयन राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए होने पर गांव और शिक्षकों ने खुशी जताई है।