रहस्यमयी रास्तों से गुजरेगी नंदा राजजात
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वाण से नंदा की कैलास की विदाई का माहौल हो जाता है। वाण के बाद नंदा की यह यात्रा जहां प्रकृति के साक्षात दर्शन कराती है, वहीं यात्रा के कई रहस्यों से भी भक्तों को अवगत कराती है। गैरोली पातल का भी इस यात्रा में विशेष महत्व है।
मान्यता है कि यहां पर मां नंदा ने राक्षसों का वध किया था। राक्षसों का मांस खाने के लिए गरुड़ आए थे, तभी से इस स्थान का नाम गैरोली पातल पड़ा, जिसका लोक जागरों में भी उल्लेख है।
नंदा की यह यात्रा गांव से लेकर हिमालय तक के सफर में एक के एक बाद कई कथाओं को समेटे हुए है। यात्रा से जुड़े हर पड़ाव में नंदा विभिन्न रूपों में पूजी जाती हैं। नंदा एक ओर बेटी है तो वहीं पिंडर और कैल घाटी में बहू हैं।
पसीने से पैदा की थी मक्खियां
जागर गायिका बसंती बिष्ट की 81 वर्षीय मां बिरमा देवी कहती हैं कि नंदा अपने भक्तों का भला करती हैं। नंदा यहां हर रूप में विराजमान हैं। जागर के माध्यम से वे गैरोली पातल नंदा की लीला का वर्णन यूं करती हैं-
नंदा ले धरो काली को रूप
बायां मारो दैंतों दय्यां ढलको।
दयां मारो दैंतों बथ्यां ढलको
पापी दैंतों को संहार करियालो।
(नंदा ने काली का रूप धारण कर लिया है और वह राक्षसों को मारने लगी है।)
मान्यता है कि गैरोली पातल में देवी ने सैकड़ों राक्षसों को मारा था। मारते-मारते जब रक्तबीज पैदा होने लगे, तो देवी ने अपने पसीने से मक्खियां पैदा कीं, जिन्होंने जमीन पर पड़े खून को चाट लिया, जिससे देवी ने सारे राक्षसों को मार दिया। यहां पर देवी ने जौला मंगरी में स्नान किया और अपने पूर्व के रूप में लौट आईं।