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'हत्या' करने के बाद मांग रहे सम्मान
अमर उजाला, प्रवेश कुमारी, देहरादून
Updated Mon, 02 Sep 2013 08:34 AM IST
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‘दो सितंबर 1994 को उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान मसूरी के छह आंदोलनकारी शहीद हुए थे।
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इस आंदोलन में राय सिंह बंगारी, धनपत सिंह, बेलमती चौहान, हंसा धनाई, मदनमोहन ममगाईं, बलवीर सिंह नेगी के साथ ही तत्कालीन सीओ उमाकांत त्रिपाठी भी शहीद हुए थे।
उन्हें भी आंदोलनकारी का दर्जा दिए जाने के लिए उत्तराखंड सरकार को संस्तुति प्रदान करने की कृपा करें...।’
ये पंक्तियां उस पत्र की हैं, जो उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष रविंद्र जुगरान को उन आंदोलनकारियों ने लिखा, जिन पर स्व. त्रिपाठी की हत्या के आरोप में सीबीआई मुकदमा चला।
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त्रिपाठी को उचित मान-सम्मान देने की मांग
आपको बेशक अजीब लगे, पर यह सच है। पत्र लिखने वालों में सुभाषिनी बर्त्वाल, सुमेर चंद्र कुमाईं, हरिमोहन गोयल, राजेंद्र सिंह पंवार, हुकम सिंह रावत, शूरवीर सिंह गुनसोला, प्रताप सिंह कैंतुरा, कर्ण सिंह बर्त्वाल, यशपाल सिंह रावत शामिल थे।
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इसी पत्र के आधार पर जुगरान ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से मुलाकात कर मसूरी गोलीकांड में ड्यूटी के दौरान मारे गए डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी को उचित मान-सम्मान देने की मांग उठाई।
मुख्यमंत्री ने भी उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है। बकौल जुगरान उनकी कई अन्य आंदोलनकारियों से भी बात हुई है। उनका मानना है कि त्रिपाठी निष्ठा और ईमानदारी के साथ कर्त्तव्य निर्वहन कर रहे थे।
उनका कसूर सिर्फ यह था कि उन्होंने आंदोलनकारियों के शांतिपूर्ण जुलूस पर पुलिस फायरिंग का विरोध किया था। इसी प्रयास में उनके हाथ में पुलिस की गोली लगी और बाद में अत्यधिक रक्तस्राव होने और चिकित्सा न मिल पाने से उन्होंने प्राण त्याग दिए।
उनकी हत्या के आरोप में आंदोलनकारियों पर मुकदमा हुआ। आठ साल पहले मुख्यमंत्री एनडी तिवारी की पहल पर ये मुकदमे वापस हो गए। अब मुकदमा झेलने वाले आंदोलनकारी त्रिपाठी के लिए वाजिब सम्मान चाहते हैं।
इसलिए हुआ था मसूरी गोलीकांड
एक सितंबर, 1994 को हुए खटीमा गोलीकांड के विरोध में मसूरी में इसके अगले ही दिन दो सितंबर, 1994 को झूलाघर में उत्तराखंड संघर्ष समिति के नेतृत्व में आंदोलनकारी आमरण अनशन पर बैठ गए थे। पुलिस ने आंदोलकारियों को जबरन उठाकर बरेली जेल भेज दिया।
खटीमा गोलीकांड और आंदोलनकारियों को जबरन उठाने के विरोध में नगर के सैकड़ों आंदोलनकारी सड़कों पर उतर आए। नारेबाजी के बीच जुलूस निकालते हुए उन्होंने धरनास्थल के हाल में प्रवेश किया ही था कि पुलिस और पीएसी ने फायरिंग शुरू कर दी।
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