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फैशन सिटी में फॉलो हो रहा 'मोदी स्टाइल'
प्रवेश कुमारी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 12 Dec 2013 12:14 PM IST
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नमो-नमो की लहर ने इन दिनों देहरादून (फैशन सिटी) के मार्केट को भी कब्जे में ले लिया है। नरेंद्र मोदी स्टाइल के कुर्तों की जबरदस्त मांग इस वक्त बनी हुई है।
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रोज का कारोबार लाखों में पहुंचा
केवल गांधी आश्रमों की बात करें तो दून में इनका रोज का कारोबार लाखों में पहुंच गया है। इनके खरीदार हर वर्ग के हैं। ज्यादातर की उम्र 25 से लेकर 40 वर्ष के बीच है।
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क्षेत्रीय गांधी आश्रम के एक कार्यालय की ही बात करें तो यहां से जहां हर रोज 70-75 कुर्ते बिक रहे थे, इस वक्त इनकी संख्या 120 के आस-पास जा पहुंची है। मोटी खादी से लेकर फाइन खादी तक की वैरायटी यहां मौजूद है।
250 रुपए से लेकर 800 रुपए तक की रेंज में ज्यादा खरीदारी हो रही है। नरेंद्र मोदी की दून में प्रस्तावित रैली के बाद इस उत्साह को पंख लगे हैं। गांधी आश्रम मैनेजर, सचिव से लेकर कार्यकर्ता तक लोगों के इस रुझान से उत्साहित हैं।
मसलीन खादी की सबसे ज्यादा डिमांड
मोदी स्टाइल कुर्तों में सबसे ज्यादा मसलीन खादी इस वक्त खरीदी जा रही है। यह फाइन क्वालिटी की खादी होती है, जो बंगाल, उड़ीसा से विशेष तौर पर आती है।
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हालांकि आम तौर पर एनएमसी ओटिन खादी की मांग रहती है। यह मसलीन से थोड़ा लो क्वालिटी की खादी है। पुराने लोग मोटी खादी को प्राथमिकता देते हैं।
सिलाई का ज्यादातर काम बिजनौर में
क्षेत्रीय गांधी कार्यालय में बिकने वाले ज्यादातर कुर्तों की सिलाई का काम धामपुर, बिजनौर में होता है। कपड़ा दक्षिण भारत, बंगाल, पूर्वांचल समेत अन्य कई स्थानों से इसके लिए आता है।
किताबों के शौकीनों के बीच भी नमो-नमो
भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी केवल कुर्तों के मामले में ही नहीं, किताबों के शौकीनों के बीच भी इस वक्त मोदी छाए हैं।
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उन पर लिखी एम मुखोपाध्याय की ‘नरेंद्र मोदी : द मैन, द टाइम्स’ खासी लोकप्रिय हो रही है, वहीं एमवी कामत, कालिंदी रांदेरी लिखित ‘वक्त की मांग : नरेंद्र मोदी’ भी नमो के चाहने वालों को खासी भा रही है।
तीन सौ रुपए से अधिक कीमत के बावजूद खरीदने वाले मन से इन किताबों को खरीद रहे हैं। कुमार पंकज की लिखी ‘नरेंद्र मोदी : ए मैन विद मिशन’ को भी पाठकों ने हाथों-हाथ लिया है।
इनका है कहना
नरेंद्र मोदी की रैली को देखते हुए इस समय अचानक मोदी स्टाइल के कुर्तों की मांग में और बढ़ोत्तरी दिख रही है। यह कम-से-कम खादी की लोकप्रियता को देखते हुए एक अच्छा संकेत है।
- वीरेंद्र त्रिपाठी, क्षेत्रीय गांधी आश्रम, पलटन बाजार