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...तो इसलिए सीमा पर बढ़ रही है चीनी घुसपैठ

Wed, 30 Jul 2014 04:08 PM IST
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 30 Jul 2014 04:08 PM IST
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migration increase chinese infiltration in uttarakhand

मोदी सरकार सीमांत क्षेत्रों में बेशक पलायन रोकने की कार्ययोजना तैयार करने में लगी हो, लेकिन हकीकत यह है कि पर्वतीय इलाकों में बड़े पैमाने पर पलायन होने से भारत की सीमाएं कमजोर हो रही हैं।

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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में यह समस्या दिनोंदिन विकराल होती जा रही है। सीमांत क्षेत्र में सुविधाओं की कमी से वहां जिंदगी पहले से ही दुश्वार है, उसपर आपदा की मार ने स्थितियां और दूभर बना दी हैं।
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नतीजा है कि सीमांत जनपदों से लोग मैदानों में जा रहे हैं। चीन के साथ साढ़े तीन सौ किलोमीटर लंबा बॉर्डर होने से सीमांत इलाकों में घटती आबादी सेना सहित अन्य सुरक्षा एजेंसियां चिंता बढ़ा रही हैं।

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पलायन की 80 फीसदी वजह रोजगार की कमी

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पलायन की समस्या राज्य गठन के पहले से है, लेकिन 14 बरस में उसकी रफ्तार कम होने के बजाय बढ़ी है।

सीमांत गांवों तक शिक्षा, स्वास्थ्य की कमजोर सुविधाओं के साथ रोजगार के विकल्प नहीं होने से पलायन बढ़ा है। 80 प्रतिशत पलायन का कारण रोजगार है।

राज्य गठन के बाद पलायन का यह रोग लाइलाज हो गया। सरकार भले कई दावे कर रही है लेकिन जनगणना के आंकड़े इसकी पोल खोल रहे हैं।

दस बरस में मैदानी क्षेत्रों में आबादी चार गुना से अधिक रफ्तार से बढ़ रही है जबकि चमोली, टिहरी, उत्तरकाशी, चंपावत में कुछ हजार की आबादी दस बरस में बढ़ी है।

सीमांत आबादी का है सामरिक महत्व

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विधानसभा सदन में रखी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस सालों में प्रदेश में 1174 गांव आबादी विहीन घोषित किए जा चुके हैं।

सीमांत इलाकों में सीमा पार होने वाली हलचल की पहली जानकारी स्थानीय लोगों से सैन्य एजेंसियों को मिली है।

उत्तराखंड से सटी चीन सीमा पर भी कई बार घुसपैठ दर्ज होने के मामले सामने आए हैं, जिसमें ताजा प्रकरण चरवाहों का है। सेना और आईटीबीपी के लिए स्थानीय लोगों से मिलने वाली जानकारी सबसे अहम है।

सैन्य एजेंसियां इन क्षेत्रों में बसी आबादी के मदद के लिए अपने स्तर पर योजनाएं चलाती है। जून 2013 की आपदा के बाद पलायन बढ़ने पर सुरक्षा एजेंसियां चिंता जता चुकी हैं।

बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्लान की जरूरत

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सीमांत क्षेत्रों के लिए केंद्र की मदद से बॉर्डर एरिया डेवलमेंट प्लान वहां सामाजिक आर्थिक ढांचे को मजबूत करने के लिए प्रभावी है।

स्वरोजगार के लिए सोलर पावर प्रोजेक्ट, पॉली हाउस, जैसे परियोजनाएं चलाई जाती हैं। पैराग्लाइडिंग, फूड प्रोसिंस जैसे हुनर की ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाते हैं।

इसकी के साथ स्कूल, अस्पताल और सड़कों को बेहतर बनाने पर खर्च होता है। औसतन 30 से 35 करोड़ रुपए पिथौरागढ़, चंपावत, उत्तरकाशी, चमोली और बागेश्वर जनपद में विकास कार्य के लिए खर्च होते हैं।

सीमांत क्षेत्रों में पहुंचने को सड़क नहीं

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सीमांत क्षेत्रों में विकास की सबसे अहम कड़ी सड़क की गैरमौजूदगी पलायन को बढ़ावा दे रही है।

सीमांत क्षेत्रों में सड़कों के लिए बीआरओ की परियोजनाएं बरसों से लटकी हुई हैं। पिथौरागढ़ और चमोली जनपद में सीमांत सड़क निर्माण की स्थिति सबसे दयनीय है।

सेना और आईटीबीपी लगातार सीमांत सड़के बनाने की मांग करती रही है, लेकिन वन पर्यावरण विभाग से एनओसी और बीआरओ की ढिलाई से बीते पांच वर्षों में महज 55 किलोमीटर सीमांत सड़क बनी है।

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