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पांच देशों में तबाही मचाएगी ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार

Mon, 17 Aug 2015 07:46 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 17 Aug 2015 07:46 PM IST
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melting glacier can invites disaster in uttarakhand.

हिमालयी क्षेत्र के इको सिस्टम में बड़े बदलाव हो रहे हैं। जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और ये उत्तराखंड के लिए बड़ी तबाही का सबब बन सकते हैं।

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वैज्ञानिक जेसी कुनियल के मुताबिक हिमालय में नदियों के स्रातों के पास बनी झीलें दबाव बढ़ने पर भारत के इंडो-गंगेटिक क्षेत्रों के अलावा पाकिस्तान, भूटान, बांग्लादेश और नेपाल में कहर बरपा सकती हैं।
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जी हां, एक तरफ तो ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं, और दूसरी तरफ ग्लेशियरों के खिसकने से हिमालय के बीचों बीच कई छोटी-छोटी झीलें बन रही हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लेशियरों के बीच में ये झीलें बर्फ के पिघलने से बनी हैं, जो हिमाचल, उत्तराखंड में कभी भी तबाही ला सकती हैं। चिंताजनक यह है कि इनसे निपटने के लिए सरकारी तंत्र के पास फिलहाल कोई विकल्प तक नहीं है।
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मनाली में इसरो आब्जरवेटरी सेंटर की ग्लेशियरों पर ताजा रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसके मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के चलते ग्लेशियर पिघलने की गति चिंताजनक है। ग्लेशियरों से पिघला पानी हिमालय में एक दर्जन से ज्यादा छोटी-बड़ी झीलों के रूप में इकट्ठा हो रहा है।

सतलुज, चिनाब, ब्यास और मंदाकिनी नदियों के स्रोतों के पास इन झीलों का बढ़ता आकार बहुत खतरनाक है। यहां झीलों के भीतर पानी का दबाव इतना बढ़ रहा है कि कभी भी इनके टूटने की स्थिति बन सकती है।

इसरो वैज्ञानिक के. कुलकर्णी के साथ रिसर्च कर रहे जीवी पंत पर्यावरण अनुसंधान केंद्र, कुल्लू के वैज्ञानिक डॉ. जेसी कुनियाल ने बताया कि लाहौल की गेपांग घाट झील की जद में सामरिक महत्व का मनाली-लेह राजमार्ग भी आ रहा है।

हिमालयी क्षेत्र में हैं लगभग तीन हजार ग्लेशियर

melting glacier can invites disaster in uttarakhand.

पार्वती नदी के स्रोत में बना ग्लेशियर भी खतरनाक स्थिति से पिघल रहा है। वहीं भागीरथी और अलकनंदा में ग्लेशियरों पर शोध कर रहीं उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र की डॉ. आशा थपलियाल ने भी ग्लेशियरों के खिसकने की पुष्टि की है।

ग्लेशियरों में आ रहे बदलाव पर वाडिया भूगर्भ संस्थान और उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के विज्ञानी भी नजर रखे हुए हैं। विज्ञानी इस पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं।

विज्ञानियों ने यमुना घाटी, भागीरथी, अलकनंदा, काली गंगा, नंदा देवी, कामेट, माना के ग्लेशियरों का अध्ययन किया है। विज्ञानियों ने बताया कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में लगभग तीन हजार ग्लेशियर हैं। इनमें सबसे तेजी से पूर्वी हिमालय के ग्लेशियरों में बदलाव आ रहा है।

इन देशों में मच सकती है तबाही

वैज्ञानिक जेसी कुनियल के मुताबिक कि हिमालय में नदियों के स्रातों के पास बनी झीलें दबाव बढ़ने पर भारत के इंडो-गंगेटिक क्षेत्रों के अलावा पाकिस्तान, भूटान, बांग्लादेश और नेपाल में कहर बरपा सकती हैं।

सरकार नहीं दे रही है कोई ध्यान
लाहौल स्पीति के विधायक रवि ठाकुर का कहना है कि वह इस मुद्दे को कई बार विधानसभा में उठा चुके है, लेकिन सरकार गंभीर नहीं है। जिले को आपदा के लिए कोई राशि नहीं मिल रही। नीलकंठ के पास बनी आधा दर्जन झीलें देख प्रशासन दंग है।

अध्ययन में तीन प्रकार की 1256 झीलें पाई गईं

- हीमोल लेक- 336
- आइस डैम्ड लेक- 800
- ग्लेशियर इरोजन लेक- 120

‘ग्लेशियर जब पीछे खिसकते हैं तो मलबा रह जाता है। गड्ढे छोटी झील के शक्ल में तब्दील हो जाते हैं। यह नहीं बताया जा सकता कि कौन सी झील खतरनाक है।’
- डॉ. डीपी डोभाल (ग्लेशियर विशेषज्ञ, वरिष्ठ विज्ञानी)

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