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एमडीडीए ने सेंटेज पर ही लुटा डाले करोड़ों रुपये, ऑडिट में हो चुका है खुलासा

Fri, 10 Aug 2018 12:26 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 10 Aug 2018 12:26 PM IST
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mdda spent a lot of mony on these work

मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) सैकड़ों करोड़ रुपये के काम अगर खुद करता या प्रदेश सरकार की कार्यदायी एजेंसियों से करवाता तो यूपीआरएनएन को सेंटेज के तौर पर लगभग 21 करोड़ और कॉंट्रेक्ट प्रॉफिट के तौर पर दी गई लगभग 23 करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि बचा सकता था। पिछले पांच साल के दौरान एमडीडीए ने सैकड़ों करोड़ रुपये के निर्माण कार्य उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम (यूपीआरएनएन) को दिए।

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किसी भी सरकार के समय में खासे चर्चित रहे उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम ने राज्य सरकार के जिन विभागों या संस्थाओं को अपनी उंगलियों पर नचाकर काम हासिल किए, उनमें एक एमडीडीए भी रहा है। एमडीडीए की यूपीआरएनएन पर खूब मेहरबानी बरसी और पिछले पांच साल की अवधि में उसे करोड़ों रुपये के काम मिले। यह खुलासा प्राधिकरण की विभिन्न परियोजनाओं की मुख्य लेखा परीक्षा में सामने आया है। यहां बता दें कि यह ऑडिट पिछले पांच साल के दौरान यूपीआरएनएन को आवंटित कार्यों को लेकर हुआ था। यह भी हो सकता है कि इस ऑडिट में पकड़ में आई खामियों के बाद ही सरकार के स्तर पर प्राधिकरण के समस्त कार्यों का विशेष ऑडिट कराने का निर्णय लिया गया।
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एमडीडीए को चपत, निगम के दोनों हाथों में लड्डू
एमडीडीए ने अपनी 10 निर्माण परियोजनाओं में निगम के दोनों हाथों में मुनाफे का लड्डू थमा दिया। उसकी मेहरबानी से निगम को निर्माण कार्यों का सेंटेज तो मिला ही साथ ही कांट्रेक्ट प्राफिट अलग से ले लिया। कायदे से कांट्रेक्ट प्रोफिट निर्माण कार्यों के इस्टीमेट (आगणक) तैयार करने वाली एजेंसी को दिया जाता है। ये काम किसी ठेकेदार एजेंसी को देने के बजाय निगम के स्टॉफ को ही दिया गया। इससे उसे अतिरिक्त लाभ मिला। इससे निगम को 22 करोड़ 81 लाख 47 हजार की चपत लगी। 
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ये हैं 10 प्रोजेक्ट
आईएसबीटी देहरादून में इंटीग्रेटेड स्कीम, इंटिग्रेटेड एफोर्डेबिल हाउसिंग स्कीम डालनवाला, इंटिग्रेटेड हाउसिंग स्कीम केत हत डोईवाला में सड़क निर्माण, ट्रांसपोर्टनगर में ईडब्ल्यूए, निम्न, मध्यम आय वर्ग के आवासीय भवन निर्माण, एमडीडीए कार्यालय में रैन बसेरा, अम्मा भोजनालय, सड़कों का निर्माण, आमवाला तरला में ग्रुप हाउसिंग के वाह्य विकास कार्य, उत्तराखंड राज्य सहकारी संघ के तहत सहकारिता भवन का निर्माण, रिस्पना व बिंदाल नदी पर पाइलैंट स्ट्रेच के तहत रिटेनिंग वाल एवं चैक डेम का निर्माण।

खुद ही निर्माण एजेंसी, फिर भी निगम को काम
खुद ही निर्माण एजेंसी होने, इंजीनियरों और तकनीकी स्टॉफ की पर्याप्त फौज होने के बावजूद मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण ने पांच साल के दौरान 338.96 करोड़ 96 लाख रुपये की निर्माण परियोजनाओं के काम निगम से कराए। ये कार्य प्राधिकरण खुद करता या लोक निर्माण विभा अथवा किसी अन्य शासकीय एजेंसी से कराता तो सेंटेज का व्यय भार बच सकता था। ये काम निगम से कराए जाने पर उसे 6.5 प्रतिशत की दर से 20 करोड़ 68 लाख 82 हजार रुपये का सेंटेज के रूप में अदा करने पड़े।

स्पेशल ऑडिट की खबर से एमडीडीए में खलबली
स्पेशल ऑडिट की खबर से बृहस्पतिवार को पूरे दिन एमडीडीए में खलबली मची रही। विशेषकर उपाध्यक्ष डा. आशीष श्रीवास्तव के पद छोड़ने की पेशकश के बाद अधिकारी-कर्मचारी आशंकित दिखे। पूरे दिन इसी बात पर कयासबाजी होती रही कि आखिर किस-किस अधिकारी पर इस ऑडिट की आंच आएगी ? बृहस्पतिवार को सुबह से ही एमडीडीए कार्यालय में स्पेशल ऑडिट को लेकर चर्चा होती रही। उपाध्यक्ष डा. आशीष श्रीवास्तव और सचिव पीसी दुमका सुबह कार्यालय नहीं पहुंचे। कुछ देर बाद पता चला उपाध्यक्ष ने शासन को पत्र लिखकर पद छोड़ने की पेशकश की है। इसके बाद पूरे कार्यालय में खलबली मच गई। हर कोई स्पेशल ऑडिट और इसकी जद में आने वालों के नामों को लेकर कयासबाजी में जुटा रहा। दुमका शाम तक सचिवालय में बैठकों में व्यस्त रहने के कारण बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं हो पाए। वहीं, अधीक्षण अभियंता अनिल त्यागी ने भी प्रतिक्रिया देने से इनकार किया। एमडीडीए में साइडलाइन अधिकारी-कर्मचारी आज कुछ ज्यादा ही खुश नजर आ रहे थे, दबी जुबान उनकी प्रतिक्रिया थी कि माल काटने वाले अब चक्कर में आएंगे। 

हिसाब-किताब में जुटे
एमडीडीए में कुछ अधिकारी और कर्मचारी पिछले पांच साल का हिसाब किताब लगाने में जुट गए हैं। सूत्रों के अनुसार पिछले पांच वर्षों के दौरान एमडीडीए का विकास कार्यों का बजट 14 से 15 करोड़ रुपये सालाना रहा है। वहीं, वेतन व कार्यालय समेत अन्य खर्च का बजट अलग है।

सीधे स्पेशल ऑडिट के आदेश पर उठ रहे सवाल
सरकार बनने के डेढ़ साल बाद बिना प्राथमिक जांच किए सीधे ही स्पेशल ऑडिट शुरू करने का आदेश चर्चा का विषय बना हुआ है। शासन के सूत्र बताते हैं कि इसके पीछे कोई शिकायत या अन्य किसी तरह के इनपुट की बात भी सामने नहीं आई है। इसके अलावा आवास विभाग के मंत्री-सचिव आदि के यूरोप जाने के ठीक पहले की गई इस कवायद को लेकर भी तमाम चर्चाएं चल रही हैं। जानकारी के मुताबिक एमडीडीए का रेगुलर ऑडिट वर्ष 2015-16 तक पूरा हो चुका है। वर्ष 16-17 और 17-18 का ऑडिट किन्हीं कारणों से नहीं हो पाया था। ऐसे में एमडीडीए वीसी डॉ. आशीष श्रीवास्तव ने आवास सचिव को पत्र लिखकर इन दो वर्षों का ऑडिट कराने को कहा। बताया जा रहा है कि विभागीय मंत्री मदन कौशिक के स्तर पर इस मुद्दे को लेकर चर्चा हुई तो दस वर्षों का स्पेशल ऑडिट कराने पर सहमति बनी। मगर बाद में इसे पांच वर्षों के लिए सीमित कर दिया गया। 

अहम बात यह भी है कि सिडकुल घोटाला और चावल घोटाला समेत अन्य मामलों में स्पेशल ऑडिट शुरू कराने के पूर्व प्राथमिक जांच इसी त्रिवेंद्र सरकार ने कराई। जांच में मिले तथ्यों के आधार पर ही स्पेशल ऑडिट शुरू किया गया। हैरानी की बात यह भी है कि एक सप्ताह के लिए विभागीय मंत्री समेत आवास विभाग के अन्य अधिकारियों के यूरोप जाने के ठीक पहले आनन-फानन में आदेश जारी किया गया। गौरतलब है कि बीते डेढ़ साल से राज्य में भाजपा सरकार है। इस दौरान तीन उपाध्यक्ष एमडीडीए में तैनात किए गए, परंतु इस बीच स्पेशल ऑडिट की बात कभी सामने नहीं आई। शासन में ऐसे तमाम बिंदुओं को लेकर खासी चर्चा रही।

आईएएस अफसरों में अंदरखाने पनप रहा रोष
कभी जांच तो कभी स्पेशल ऑडिट में एक के बाद एक आईएएस अफसरों के घिरने से राज्य की नौकरशाही में रोष पनप रहा है। बताते हैं कि उन्हीं के बीच एक गुट का इन सबसे पीछे जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। अधिकारी खुलकर इनका नाम लेने से भी नहीं हिचक रहे हैं। अलबत्ता दबी जुबान से कामकाज हल्का करने की बात जरूर कह रहे हैं। अधिकारियों के बीच हो रही चर्चाओं में यह बात सामने आ रही है कि नियम-कानून का पालन होना चाहिए और यदि कोई इससे इतर जाता है तो उसके खिलाफ वैधानिक तरीके से कार्रवाई भी होनी चाहिए। मगर जानबूझकर अफसरों को निशाना बनाए जाने को लेकर नाराजगी है। एनएच-74 में पंकज पांडेय और चंद्रेश, एमडीडीए में स्पेशल ऑडिट कराकर आर. मीनाक्षी सुंदरम के बाद कुछ और अफसरों का नंबर आने की बात कही जा रही है।


एक अधिकारी ने कहा कि राज्य का छोटा कैडर है। यहां गिनती के आईएएस अधिकारी हैं। ऐसे में अगर एक के बाद एक अफसरों को नापने का क्रम चलता रहेगा, तो विभागीय काम करने से अधिकारी हिचकेंगे। यह भी कहा कि अनियमितताओं के ज्यादातर मामलों में राजनीति हस्तक्षेप होता है, जो अक्सर सामने नहीं आता है। उधर जिस तरह से खुद को एमडीडीए से हटाने के लिए डॉ. आशीष श्रीवास्तव ने खुद को पद से हटाने संबंधी पत्र लिखा है, उसे लेकर नौकरशाही में सराहना भी हो रही है। बताते हैं कि आईएएस अधिकारी इस मुद्दे पर जल्द ही बैठक करके मुख्यमंत्री से मुलाकात भी कर सकते हैं। कुल मिलाकर खींचतान बढ़ रही है, जिससे राज्य में आईएएस अधिकारियों के बीच ही प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।

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