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जात नहीं, चाहिए तो बस जीवनभर का साथ

Mon, 02 Dec 2013 01:33 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 02 Dec 2013 01:33 PM IST
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जात-पांत के नाम पर जहां तलवारें खिंच जाती हैं, खाप बैठ जाती हैं, हुक्का-पानी बंद हो जाता है। वहीं कुछ लोगों ने इस दायरे से बाहर निकलने की पहल की है।

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एक वैवाहिक वेबसाइट की ओर से रविवार को देहरादून के जाखन स्थित एक रिजॉर्ट में परिचय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में 150 लोगों ने पंजीकरण कराया था।

अच्छी बात यह थी कि यहां आए अधिकतर लोगों के लिए वर-वधू की शिक्षा, नौकरी जैसे पहलू तो मायने रखते थे लेकिन वे जाति के दायरे में नहीं बंधे थे।

जाति क्या देखनी...
हरिद्वार निवासी 25 वर्षीय तपस्या मां ज्योत्सना संग अपने वर की तलाश में हैं। बताया कि वह अहमदाबाद में रिसर्च साइंटिस्ट हैं। एक भाई 23 साल का है, जो हरिद्वार में साइबर कैफे चलाता है।
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दूसरा 27 साल का है और महिंद्रा में जॉब करता है। तपस्या ने बताया कि वे गुजराती ब्राह्मण हैं। पिता का निधन हो चुका है, रिश्तेदारों के नाम पर कोई नहीं है।

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ऐसे में खुद ही तीनों भाई-बहनों के लिए रिश्ता तलाश रही हैं। कहा कि जब खुद ही जीवनसाथी चुनना है तो जाति क्या देखनी। वर-वधू का व्यवहार बेहतर हो, बस यही चाहिए।

किसी भी जाति की हो क्या फर्क पड़ता है
पटेल रोड दून निवासी प्रदीप कुमार अपने बेटे के लिए रिश्ता ढूंढ रहे हैं। बेटे की हाइट काफी ज्यादा है। प्रदीप बताते हैं, पहले अपनी बिरादरी में ही वधू की तलाश की गई। कई जगह बात चली, लेकिन हाइट के पैमाने पर मामला अटक जाता।

कहीं रिश्ता नहीं मिला तो जाति बंधन की शर्त छोड़ दी। प्रदीप कहते हैं जिंदगी तो बेटे-बहू ने साथ निभानी है। बहू अच्छी हो, परिवार बांधकर रखे बस...। फिर वह किसी भी जाति की हो क्या फर्क पड़ता है।

45 वर्ष तक का रिश्ता
यहां कई तलाकशुदा और विधुर व्यक्ति भी जीवनसाथी तलाशने आए थे। सबसे अधिक उम्र का रिश्ता 45 वर्षीय व्यक्ति का था, जिनके 16 और 17 साल के दो बच्चे भी हैं।

वेबसाइट निदेशक अतुल कुमार वर्मा ने बताया कि सम्मेलन में 30-35 वर्ष के कई रिश्ते आए थे। ज्यादातर ने जाति से अधिक जिंदगी भर साथ निभाने वाला रिश्ता जोड़ने को प्राथमिकता दी। हालांकि, आयोजकों ने कुंडली मिलान के बाद आगे वेरिफिकेशन करने का जिम्मा संबंधित लोगों पर ही छोड़ दिया।


नौकरीपेशा नहीं, गृहिणी को वरीयता
सम्मेलन में आए अधिकतर लोगों ने नौकरीपेशा बहू की जगह गृहिणी को वरीयता देने की बात कही। सास-ससुर और ननद-देवर के अलावा ज्यादातर वरों का भी यही कहना था कि पत्नी घर पर ही रहे तो बेहतर।

वजह पूछी तो बताया कि बहू नौकरी करेगी तो परिवार पर ध्यान नहीं दे पाएगी। परिवार संभालने, बच्चों को बेहतर परवरिश देने के लिए घरेलू वधू चाहते थे। आयोजकों ने बताया कि इन दिनों लोग नौकरीपेशा युवतियों को तवज्जो नहीं दे रहे।

दून का मिजाज जरा अलग

वेबसाइट से जुड़े विक्रम कौशल ने बताया कि शादियों के मामले में दून का मिजाज पुराना ही है। यहां लोग वेबसाइटों, परिचय सम्मेलनों जैसे आयोजनों पर पूरी तरह से भरोसा नहीं करते।

अगर ऐसे आयोजनों में रिश्ता हो भी जाता है तो लोग रिश्तेदारों या कहीं से जान-पहचान निकालने के बाद खोजबीन करते हैं। तसल्ली हो जाने के बाद ही शादी की जाती है।

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