अंतिम सांस तक नक्सलियों से लड़ता रहा देवभूमि का सपूत योगेश, इस तरह किया उग्रवादियों का सामना
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सीने से गोली आर पार होने के बाद भी 22 साल के योगेश परगाईं ने हार नहीं मानी और मोर्चा संभाले रहे। हालांकि, ज्यादा खून बह जाने के कारण वह अधिक देर तक उग्रवादियों का सामना नहीं कर पाए और देश के लिए प्राणों की आहुति दे दी।
शहीद योगेश का गांव तक सड़क पहुंचाने का सपना पूरा होगा। भीमताल विधायक राम सिंह कैड़ा ने भदरकोट गांव में दो किमी सड़क शहीद योगेश परगाईं के नाम से बनाने की घोषणा की है। इस सड़क के निर्माण का खर्चा वह अपनी विधायक निधि से देंगे। उन्होंने कहा कि योगेश की शहादत का कोई मोल नहीं है गांव वाले उनकी शहादत को याद रखेंगे।
नगालैंड में चार कुमाऊं रेजीमेंट की कभी भी तैनाती नहीं होती थी। दो साल पहले ही रेजीमेंट वहां भेजी गई। जब यूनिट कोहिमा भेजी गई तो योगेश भी साथ गए। घर में सबसे छोटे लाडले योगेश का पार्थिव शरीर देखकर मां तारी देवी, बहन नीमा भंडारी और भाभी कमला बदहवास हो गईं। परिजन उन्हें बार-बार होश में लाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वो बेसुध ही रहीं।
नगालैंड से चार कुमाऊं रेजीमेंट के सूबेदार जगत सिंह शहीद योगेश का पार्थिव शरीर लेकर दिल्ली पहुंचे। वहां से सीएचएम दिनेश सिंह, नायक हरीश हर्बोला भी साथ हो लिए और सेना के वाहन से लेकर हल्द्वानी पहुंचे। शहीद योगेश के पार्थिव शरीर पर लिपटा तिरंगा जब भाई मुकेश परगाईं को दिया गया तो वह फूट-फूट कर रोने लगे। तिरंगे को सीने से लगाकर उन्होंने भाई की शहादत को सलाम किया और सेना के अफसरों से देश के दुश्मनों का खात्मा करने के लिए कहा।