मां तुझे प्रणाम : स्वर्णिम भारत के निर्माण को स्वर्ण सिंह ने काटी थी जेल, याद कर रो उठता है दिल
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उम्र भले ही 100 बरस हो गई। पर देश आजादी के लिए (अगस्त क्रांति) अंग्रेजों भारत छोड़ों आंदोलन में योगदान कर इतिहास का साक्षी बने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्ण सिंह का जज्बा मिसाल है।
भारत के आजाद होने पर उन्हें गर्व तो है पर बंटवारे के दिन आज भी उनके जख्मों को कुरेदते रहते हैं। विभाजन के दिनों में जब वह पाकिस्तान से भारत आ रहे थे तो युद्ध के दौरान पाकिस्तानियों ने उनकी मां का कत्ल कर बेरहमी से उनके टुकड़े टुकड़े कर दिए। इस वाकिये को याद कर उनकी आंखें भर आती हैं।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्ण सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों सितम को याद करते हएु अगस्त क्रांति की गाथा सुनाई। उनका जन्म एक जनवरी 1919 को ग्राम भुट्टर थाना चूड़काना जिला शेखुपुरा पाकिस्तान के नमक कारोबारी गुरवचन सिंह और माता बलकार कौर के घर हुआ था।
1942 में जब देश आजादी के लिए आंदोलन हो रहा था तो स्वर्ण सिंह भी 23 साल की आयु में उस आंदोलन के भागीदार बन गए। उन्होंने अंग्रेजों को लाठियां खाईं और एक बरस तक लाहौर जेल में भी बंद रहे।
कई बार उन्हें भी गिरफ्तार किया, लेकिन वहां के थानेदार सरदार गुरदयाल ने उन्हें बचा लिया। वह कहते हैं कि महापुरुषों की अगुवाई में देश तो आजाद हो गया, लेकिन अंग्रेजों की फूट डालो नीति ने भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच खाई खोद दी।
जुल्मों-सितम इस हद तक बढ़ गए कि दोनों देश के बीच विभाजन हो गया। बंटवारे के दौरान लाहौर से पंजाब आने वाले सिखों का ट्रेन में ही पाकिस्तानियों ने कत्ल कर दिया। ट्रेन से उनकी मां बलकार कौर भी भारत आ रही थी, उनके शव को टुकड़ों में देखकर आज भी स्वर्ण सिंह सहम उठते हैं। उस दौर की यादें साझा करते समय स्वर्ण सिंह की आंखें भर आईं और गला रुंध गया।
नैनीताल में पंजाब के सीएम ने था बसाया
भारत के स्वाधीन होने के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री बने प्रताप सिंह कैरों ने स्वर्ण सिंह के परिवार को नैनीताल जिले में बसाया था। स्वर्ण सिंह बताते हैं कि 1945 में वह अपने परिवार के साथ जालंधर पहुंचे। एक साल बिताने के बाद पटियाला आ गए। 1952 में खुड्डा पोस्ट सनौर पटियाला पंजाब की हरभजन कौर से शादी रचाई। उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं।
सिख बेटियों को बचाकर लाए थे रिफ्यूजी कैंप
अंग्रेजों की फूट डालो नीति पर जब विभाजन हुआ तो पाकिस्तानियों ने सिख बेटियों को बंधक बना लिया। जिन्हें वह अपने तीन अन्य साथियों के साथ बचाकर रिफ्यूजी कैंप लेकर आए। विभाजन का मंजर आज उनकी आत्मा को झकझोर देता है।
चार भाषाओं के जानकार हैं स्वर्ण
स्वर्ण सिंह ने पाकिस्तान में उर्दू से चार जमात तक शिक्षा ली थी। जब वह पटियाला आए तो उन्होंने गुरमुखी (पंजाबी) सीखी और वह हिंदी, उर्दू, पंजाबी के अलावा फारसी भाषा का भी ज्ञान रखते हैं।
कवि भी है स्वर्ण सिंह
कीर्ति कुरबानी तू देश आजाद बदले, नया समा पतंगा तूं भगत सिंह..बस मार रेला उड़ा दितियां, असंबेली बंब चलाए तूं भगत सिंह..तू बदल तकदीर तस्वीर देती, ऐसे चंद चड़ाए तूं भगत सिंह..शमेर पर्वत दी सिने पार सुटे, ऐसे एटम चलाए तू भगत सिंह....।
देश पर कुर्बान शहीद सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सिंह की फांसी को याद करते हुए स्वर्ण ने अपनी कलम से कविताएं लिख डालीं। उन्होंने जपु जी साहिब सटीक समेत कई धार्मिक किताबें भी लिखीं। धर्म के प्रति गहरी आस्था होने से ही उन्हें उत्तर भारत के ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब का रिसीवर भी चुना गया था।