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35 सालों से कब्जाए बैठे हैं देहरादून नगर निगम की जमीन

Thu, 01 Oct 2015 08:19 PM IST
डॉ. योगेश योगी/ अमर उजाला, देहरादून
डॉ. योगेश योगी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 01 Oct 2015 08:19 PM IST
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land possession by Municipal Corporation dehradun.

देहरादून के ब्राह्मणवाला में अधिकतम पांच साल के लिए मिलने वाले आसामी पट्टों पर 40 साल तक खेती होती रही।

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करीब 140 बीघा जमीन अब नगर निगम के कब्जे में है, लेकिन पट्टे की अवधि के बाद करीब 35 साल की खेती का हिसाब कौन देगा? अवधि बीतने के बाद आसामी पट्टों की जमीन कब्जामुक्त क्यों नहीं कराई गई? इसको लेकर किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। इस जमीन की कीमत करीब 100 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

वर्ष 1975-76 में ब्राह्मणवाला में 23 व्यक्तियों को खेती के लिए आसामी पट्टे दिए गए थे। यह पट्टे साल दर साल दिए जाते हैं और इनकी अधिकतम अवधि पांच साल होती है। लेकिन ब्राह्मणवाला में पट्टेधारक 1975-76 से लेकर 2015 तक खेती करते रहे।
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20 जनवरी 2000 को पट्टाधारकों ने पट्टा भूमि पर अपने नाम संक्रमणीय भूमिधर वाले भूमिधर के तौर पर दर्ज करने का प्रार्थनापत्र राजस्व विभाग को दिया। जिसके बाद मामला सामने आया। इससे पहले किसी अधिकारी को इस बेशकीमती जमीन की सुध नहीं आई। पिछले 15 सालों में मामले की फाइलें राजस्व न्यायालयों में इधर से उधर घूमती रही।
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मामले में एसडीएम सदर अरविंद पांडे के न्यायालय की ओर से 17 अगस्त 2015 को निर्णय दिया गया। न्यायालय ने आसामी पट्टों पर दर्ज 23 पट्टेदारों के नाम निरस्त करने और इस भूमि को नगर निगम देहरादून के नाम अंकित करने का आदेश दिया था। जिसके बाद पिछले महीने ही नगर निगम ने इस जमीन पर कब्जा ले लिया था।

पिछले कई सालों से मामला न्यायालय में लंबित था, जिसके चलते जमीन से कब्जा हटाने की कार्रवाई नहीं की गई। जैसे ही न्यायालय का निर्णय आया, नगर निगम को कब्जा दिला दिया गया। वर्ष 2000 से पूर्व कार्रवाई क्यों नहीं हुई इस बाबत कुछ नहीं कहा जा सकता।
- अरविंद पांडे, एसडीएम सदर

पट्टाधारकों का तर्क

पट्टाधारकों की ओर से सद्भावना फल एवं सब्जी कल्याण समिति ने न्यायालय में तर्क दिया कि कृषि कार्य के लिए भूमि का आवंटन किया गया था। जिस पर पट्टेधारक फल-सब्जी उगाकर परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं।

राजस्व अभिलेखों में पट्टेधारकों को भूलवश आसामी पट्टा दर्ज हो गया। यह भूमि नदी तट से काफी ऊंचाई पर है और आवंटी लगातार भूमि पर काबिज हैं। इस प्रकार आवंटी स्वत: ही भूमिधरी अधिकार प्राप्त कर चुके हैं।


आसामी पट्टे की अधिकतम अवधि पांच साल

आसामी पट्टेदार साल दर साल के होते हैं। आसामी पट्टे की अवधि अधिकतम पांच साल होती है। शासकीय अधिवक्ता (राजस्व) का कहना कि आसामी पट्टेदारों को संक्रमणीय और असंक्रमणीय अधिकार इस भूमि पर नहीं दिए जा सकते और न ही उन्हें राजस्व अभिलेखों में भूमिधर अंकित किया जा सकता है।

जमींदारी विनाश एवं भू व्यवस्था नियमावली के नियम 176 क के अनुसार आसामी पट्टेदारों का पट्टा किसी भी समय समाप्त किया जा सकता है।

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