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बचपन से ही भगोड़े हैं IPL पूर्व कमिश्नर ललित मोदी

Fri, 19 Jun 2015 05:10 PM IST
गिरीश रंजन तिवारी/ अमर उजाला, नैनीताल
गिरीश रंजन तिवारी/ अमर उजाला, नैनीताल Updated Fri, 19 Jun 2015 05:10 PM IST
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lalit modi and sushma swaraj dispute.

आईपीएल के जरिये क्रिकेट को ग्लैमरस बनाने वाले आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी को आज भले ही भगोड़ा कहे जाने पर आपत्ति है और वे एक तरह से इंग्लैंड में भारत से निष्कासित रूप में जीवन व्यतीत करने को बाध्य है, लेकिन सच्चाई यह है कि भगोड़ा और निष्कासित शब्द तो उनके साथ छात्र जीवन में ही जुड़ गए थे।

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जब वे नैनीताल के सेंट जोसेफ कॉलेज में दसवीं के छात्र थे तो दोस्तों के साथ स्कूल से भागने के कारण उन्हें दसवीं की बोर्ड परीक्षा से पूर्व स्कूल से निष्कासित कर दिया गया था। उनके पिता केके मोदी के लाख प्रयास के बावजूद उन्हें फिर विद्यालय में प्रवेश नहीं मिला। हालांकि, बाद में उन्हें बाहर रहकर बोर्ड परीक्षा देने की अनुमति दी गई।
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ललित मोदी ने 1976 में सेंट जोसेफ कॉलेज नैनीताल में दाखिला लिया था। वे यहां 1980 तक रहे। 1980 में उनके साथ पढ़े विद्यार्थी बताते हैं कि बोर्ड परीक्षा से पूर्व वे एक दिन अपने चार साथियों सहित कालेज से भाग गए। बाद में पकड़े जाने के बाद विद्यालय प्रबंधन ने चारों को निष्कासित कर दिया था।

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पढ़ाई में बेहद औसत थे ललित मोदी

lalit modi and sushma swaraj dispute.

इससे पूर्व भी 1978 में अशोक फिल्म थियेटर में वह फिल्म ‘दीवार’ देखते हुए पकड़े गए थे। उनके साथ पढ़े छात्रों के मुताबिक वह स्कूल में रहकर परीक्षा नहीं दे पाए थे। हालांकि, उद्योगपति गुजरलाल का पोता होने के कारण उनकी विद्यालय में काफी पहुंच थी पर अनुशासनप्रिय तत्कालीन प्रधानाचार्य ब्रदर डोनो के आगे उनकी एक नहीं चली।

सेंट जोसेफ के वर्तमान प्रधानाचार्य डॉ. पीटर एमेन्यूएल ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि ललित मोदी का निष्कासन अनुशासनहीनता के कारण हुआ था। उनके साथ पढ़ाई कर चुके छात्र बताते हैं कि मोदी पढ़ाई में बेहद औसत थे। गेम्स में भी उनकी रुचि नहीं थी।

उनके मुताबिक बाद में अमेरिका में भी मोदी किसी प्रकरण में दोषी पाए गए थे और इसके लिए उन्हें समाज सेवा करने के रूप में सुधारात्मक दंड भी दिया गया था। हालांकि, उनके सहपाठी कहते हैं कि स्कूल में वे अंग्रेजी न जानने वालों के लिए अंग्रेजी की प्रसिद्ध फिल्मों में हिंदी के सब टाइटल दिए जाने की कल्पना करते थे और बाद में भारत में इसकी शुरुआत भी उन्होंने ही की।

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