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उत्तराखंडः सिस्टम ने आपदा पीड़ित को बनाया भिखारी

Sun, 22 Feb 2015 04:27 PM IST
ठाकुर सिंह नेगी / अमर उजाला, ऋषिकेश
ठाकुर सिंह नेगी / अमर उजाला, ऋषिकेश Updated Sun, 22 Feb 2015 04:27 PM IST
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kedarnath disaster victim became beggar.

जून 2013 में केदारनाथ की विनाशकारी आपदा से पीड़ित एक व्यक्ति को सरकारी तंत्र ने भीख मांगने को मजबूर कर दिया। उसका भरापूरा परिवार त्रासदी में दफन हो गया, घर और खेतीबाड़ी का नामोनिशान तक नहीं बचा।

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मगर, अभागे की दास्तां यहीं खत्म नहीं हुई। इतना कुछ होने के बाद वह सरकार और प्रशासन के सामने साबित नहीं कर पाया कि उसका सब कुछ लुट चुका है। जिम्मेदार अफसरों ने तो उसके अस्तित्व को ही नकार दिया। उसे न तो खोए हुए परिजन मिले और न आपदा का मुआवजा।
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यह दास्तान है रुद्रप्रयाग जिले के गौरीकुंड निवासी 45 वर्षीय गणेश नौटियाल की। जो इन दिनों ऋषिकेश में दर-दर भटककर पेट पालने के लिए भिक्षावृत्ति कर रहे हैं। बकौल गणेश, 16 और 17 जून- 2013 को केदारघाटी में आई दैवी आपदा ने उसके परिवार को लील लिया।

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गौरीकुड मुख्य बाजार में रहता था परिवार

kedarnath disaster victim became beggar.

वह उस समय चंडीगढ़ में नौकरी करता था, जबकि परिवार गौरीकुड मुख्य बाजार स्थित घर में रह रहा था। बताया कि मंदाकिनी नदी में प्रचंड बाढ़ के कारण उसका मकान ढह गया, जबकि पत्नी सीमा, बेटा दीपक, बेटी पूजा और इंदु मलबे के साथ लापता हो गए।

चंडीगढ़ से घर लौटे गणेश ने परिजनों की खोजबीन की, मगर कोई पता नहीं चला। बताया कि आपदा में घर के साथ सब कुछ बह गया था। परिजनों को ढूंढने और मुआवजे के लिए उसने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई। मगर अफसरों ने यह कहकर उसकी गुहार को ठुकरा दिया कि उनके परिजनों और जमीन जायदाद से संबंधित अभिलेख मौजूद नहीं हैं।

हताश गणेश तब से अब तक न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है। सरकारी तंत्र से उम्मीद खोकर उसने अब साधु का वेश धारण कर लिया है। बताया कि भिक्षावृत्ति से पेट तो पल रहा है, मगर परिजनों को खोने का दुख आज भी उसे सालता है।

गले में लटका दी तख्ती

परिवार को खोने के गम में गणेश मानसिक रूप से परेशान हो चुका है। उसे अभी भी उम्मीद है कि एक रोज उसका परिवार मिल जाएगा। सरकार से मदद की उम्मीद के लिए वह गले में तख्ती लटकाए घूम रहा है। उसे भरोसा है कि शायद कभी प्रशासन को उस पर तरस आ जाए और उसे मदद मिले।

12 परिवारों का मिट गया था नामोनिशान

kedarnath disaster victim became beggar.

केदारनाथ आपदा में गणेश ही नहीं गांव के अन्य 12 परिवारों का भी नामोनिशान मिट गया था। कई परिवारों की तो खोज खबर करने के लिए भी कोई नहीं बचा।

बताया कि गांव के इन परिवारों को भी आज तक मुआवजा नहीं मिला है। सरकार और प्रशासन ने खानापूर्ति के लिए सहायता राशि बांटी, जबकि कई वास्तविक प्रभावितों को अभी भी न्याय नहीं मिल पाया है।

त्रिवेणीघाट पर खुले में कटती है रात
जिस व्यक्ति का महज दो साल पहले भरापूरा परिवार, मकान और खेतीबाड़ी थी, उसकी रात आज त्रिवेणीघाट पर खुले आसमान के नीचे कट रही है।

सिस्टम से हताश होकर निराशा में डूबे व्यक्ति के जीवन का अब कोई आधार नहीं बचा है। वह करीब छह महीने से यहीं घाट पर रह रहा है। आश्रमों से मिलने वाले भोजन और भिक्षावृत्ति से उसका जीवन जैसे-तैसे चल रहा है।

नगरवासियों ने महसूस किया दर्द

गणेश का दर्द भले ही सरकार और प्रशासन ने महसूस न किया हो, मगर नगरवासियों को उससे सहानुभूति है। पालिका सभासद शिवकुमार गौतम, संजीव पाल, मुकेश कुमार आदि ने उसका आर्थिक सहयोग किया। गौतम ने बताया कि इस दिशा में वह शीघ्र जिलाधिकारी को ज्ञापन देंगे।

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