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अल्लाह का नाम और भोले का काम
डॉ. योगेश योगी
Updated Fri, 19 Jul 2013 12:14 PM IST
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जुबां पर अल्लाह का नाम और भोले का काम। इस गंग-जमुनी तहजीब के दीदार करने हैं तो हरिद्वार की मुसलिम बस्ती में आइए। एक-दो नहीं बल्कि एक ही बस्ती के 80 मुस्लिम परिवार कांवड़ बनाने के काम में जुटे हैं।
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ये मिसाल हैं
मुकद्दस रमजान में सभी रोजे रखते हैं। पांचों वक्त की नमाज पढ़ते हैं लेकिन तल्लीनता से शिव की कांवड़ भी बनाते हैं। तरह-तरह के कांवड़। कहीं शिवलिंग की आकृति बना रहे तो कहीं मंदिर की। मजहबी भेदभाव पैदा करने वालों के लिए ये मिसाल बने हैं।
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ज्वालापुर लाल पुल के निकट स्थित इंदिरानगर कालोनी मुस्लिम बस्ती है। यहां की गलियों में आजकल हर ओर कांवड़ ही कांवड़ दिखाई देगी। घरों के आंगन से लेकर मकान तक छतों तक पर कारीगर कांवड़ बनाने में लगे हुए हैं। खुदा की इबादत के बाद जो भी वक्त बचता है, उसमें कांवड़ बनाने में जुट जाते हैं। कांवड़ मेले में भोले के भक्तों के कंधों पर सजी शिवलिंग और मंदिरनुमा अधिकतर कांवड़ ज्वालापुर के इन्हीं रोजेदारों के हाथों से बनी होंगी।
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रमजान में रात में ज्यादा होता है काम
कांवड़ बनाने वाले कारीगरों ने बताया कि रमजान में दिन में कुछ खाना-पीना नहीं होता। इसलिए दिन में कांवड़ बनाने के काम की गति भी कम हो जाती है। रात को रोजा इफ्तार के बाद कांवड़ बनाने का काम खूब तेजी से चलता है। आजकल रात को ही ज्यादा काम चल रहा है। एक कारीगर ने बताया कि रात को काम करते हैं तो दिन की गर्मी से भी छुटकारा मिल जाता है।
22 साल से कांवड़ बनाने का काम कर रहा हूं। पूरे परिवार की रोजी-रोटी इससे ही चलती है। कांवड़ खरीदने वाले कांवड़िए पूछ बैठते हैं कि मुस्लिम होकर यह काम कैसे कर पाते हैं। उनको एक ही जवाब देते हैं- हम किसी से बैर नहीं रखते। हरिद्वार में हिंदू भाई भी हमें पूरा सम्मान देते हैं। फिर लड़ाई से कभी किसी का भला नहीं हुआ है।
- महबूब (कांवड़ बनाने वाले कारीगर)
काम तो काम है। धर्म इसमें कहीं आड़े नहीं आता है। हमने रोजे रखे हैं। पांचों वक्त नमाज पढ़ते हैं और रात को दो घंटे तरावीह पढ़कर आते हैं। जो समय मिलता है, उसमें कांवड़ बनाने का काम करते हैं। हमारे आसपास पूरी मुस्लिम बस्ती में कांवड़ बनती है। पूरे साल कांवड़ मेले से उम्मीदें लगी रहती हैं।
- गुलजार (कांवड़ बनाने वाले कारीगर)