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अनुच्छेद 370: पूर्व सैनिक और कश्मीरी पंडितों में खुशी की लहर, बोले-इस पल का सालों से था इंतजार 

Tue, 06 Aug 2019 08:27 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून/हल्द्वानी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून/हल्द्वानी Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 06 Aug 2019 08:27 AM IST
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Kashmiri pandit and Ex Serviceman reaction on Article 370 revoked from jammu and kashmir
पूर्व सैनिक - फोटो : अमर उजाला

जैसे ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने संबंधी संकल्प और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल राज्यसभा में पेश किया, हल्द्वानी में टीवी से चिपके कश्मीरी पंडित परिवारों का खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वहीं पूर्व सैनिकों का कहना है कि बहुत पहले यह फैसला हो जाना चाहिए था।

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उनका कहना था कि इस पल का उन्हें सालों से इंतजार था। जो दुख, दर्द झेला है... वह शब्दों में बयां नहीं हो सकता है। कुछ भी नहीं बचा। यहां पर नए सिरे से शुरुआत की गई। कई परिवार नब्बे के दशक में कश्मीर में हुए उपद्रव के बाद हल्द्वानी पहुंचे।  
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अब अपनी मातृभूमि को देखने का मौका मिलेगा
एक स्कूल चलाने वाले समित टिक्कू का पुश्तैनी घर हबाकजल (श्रीनगर) में है। समित टिक्कू बताते हैं कि 1947 बंटवारे के समय उनका परिवार यहां पर आया। उस वक्त दादा महाराज किशन टिक्कू यहां जेजे फैक्ट्री में जनरल मैनेजर बने। इसके बाद परिवार यहीं का होकर रह गया। जब कश्मीर में उपद्रव शुरू हुआ तो कई लोग वहां से पलायन कर हल्द्वानी भी पहुंचे थे, उस वक्त उनकी मां ने लोगों को नौकरी दिलाने समेत दूसरी मदद की। इस निर्णय का लंबे समय से इंतजार था। अब जल्द ही अपने परिवार, बच्चों के साथ अपनी मातृभूमि को देखने का मौका मिलेगा।  
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नब्बे के दशक में जला दिया था घर
दंत चिकित्सक डॉ. राजेश रोशन मूल रूप से जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के नागरी गांव के रहने वाले हैं। वह बताते हैं कि नब्बे के दशक में उनके घर को जला दिया गया। उस वक्त वह बीडीएस की पढ़ाई कर रहे थे। उनके माता-पिता का कोई भी पता नहीं चल रहा था। हर जगह अफरातफरी फैली हुई थी। दो दिन बाद जम्मू के शिविर में माता-पिता मिले। उस वक्त को याद कर सिहर उठता हूं। मेरे रिश्तेदार हैं, उनका आज तक कोई पता नहीं चला है। 

बहुत मुश्किल भरे दिन थे वे

नवाबी रोड के रहने वाले विनीत कौल डेमबी बताते हैं कि उनके पिता कश्मीर विवि में पढ़ाते थे। उनका घर श्रीनगर के रैनाबाड़ी में था। उनकी नौकरी नब्बे के दशक में हल्द्वानी में लगी थी, उस वक्त पिता डा. बीके कौल मुझसे मिलने हल्द्वानी आए थे। उसी वक्त वहां उपद्रव शुरू हो गया। उनके घर पर कब्जा तक कर लिया गया। पिता बीके कौल इतिहासकार थे। उन्होंने कई किताबें लिखीं। घर, नौकरी सब कुछ छूट गया। बहुत मुश्किल भरे दिन थे। मां की तबीयत भी इसी के चलते खराब हुई। यहां पर शून्य से शुरुआत की गई। बाद में उनके पिता ने कुमाऊं विवि के इतिहास विभाग में विजिटर प्रवक्ता के तौर पर काम किया। यह फैसला दिल को ठंडक देने वाला है।
 
विस्थापित कश्मीरी पंडितों को मिलेगी राहत 
मार्च-1990 के उस नजारे को याद कर केके कौल (69) सिहर उठते हैं। कौल बताते हैं कि कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया जा रहा था। तब खुद और परिवार की जान बचाने के लिए वहां से भागने को मजबूर हुए थे। जमीन, मकान और सब कुछ श्रीनगर में छूट गया। कुछ समय जम्मू में रहने के बाद वह हल्द्वानी आ गए। यहां एचएमटी फैक्ट्री में नौकरी ज्वॉइन की और 2007 में डीजीएम (प्रशासन) के पद से सेवानिवृत्त हुए। तीन साल पहले जब वह एक टूरिस्ट की तरह श्रीनगर पहुंचे तो देखा कि उनके मकान और जमीन पर लोगों ने कब्जा किया हुआ है। सरकार के इस फैसले से विस्थापित कश्मीरी पंडितों को राहत मिलेगी। यदि भविष्य में कश्मीर के हालात बेहतर होंगे तो वह जरूर अपने गृह क्षेत्र में लौटेंगे।

पूर्व सैनिकों ने बताया एतिहासिक फैसला

पूर्व सैनिक का कहना है कि यह फैसला बहुत पहले हो जाना चाहिए था। इस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में अमन शांति आएगी और आतंक-आतंकवादियों के साथ ही अलगाववादियों पर भी शिकंजा करेगा। लद्दाख क्षेत्र को अलग होने से यहां का विकास होगा और अब एक देश में एक कानून और एक झंडा लहराएगा। 

यह कदम बहुत पहले उठाया जाना चाहिए था। राजनीतिक पार्टियों ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इसे अटकाया हुआ था। कश्मीर में कई अलगाववादी इसी अनुच्छेद की आड़ में यहां अपना बर्चस्व जमाए हुए थे। आज भी तमाम लोग यहां तंबू में रहने को मजबूर हैं। अनुच्छेद 370 के हटने से जम्मू में अमन शांति का माहौल होगा और आतंकवादी घटनाओं पर रोक लगेगी।
 एमसी भंडारी, लेफ्टिनेंट जनरल (सेनि.)

अनुच्छेद 370 हटने से आतंकवाद जैसे नासूर की स्थाई सर्जरी हो पाएगी। अभी तक आतंकवादियों को जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है। घाटी में बड़ी संख्या में अलगाववादी और दूसरे संगठन आतंकवादियों की मदद करते हैं। इसी का नतीजा है कि सेना के खिलाफ करीब 1365 एफआईआर दर्ज हैं। अब यहां से आतंकवाद का सफाया करने में आसानी होगी। 
ओपी कौशिक, लेफ्टिनेंट जनरल (सेनि) 

अभी हम जम्मू-कश्मीर जाते हैं, तो ऐसे लगता है कि किसी दूसरे में जा रहे हैं। अलग झंडा, अलग कानून। इस फैसले से कश्मीर के लोग भी बहुत खुश होंगे। क्योंकि अब उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। पहले कुछ लोग आतंकवादियों के डर से उन्हें पनाह देने के लिए मजबूर थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अब यहां विकास होगा। सेना को भी यहां अब आतंकवाद के खिलाफ सख्ती से निपटने में कोई समस्या नहीं आएगी। 
केजी बहल, ब्रिगेडियर (सेनि) 

अनुच्छेद 370 हटने और लद्दाख क्षेत्र को अलग राज्य बनाने का फैसला स्वागत योग्य है। अब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगेगी। भारतीय फौज के साथ जो दुर्व्यवहार और राष्ट्रीय ध्वज का अपमान हो रहा था, उस पर लगाम लगेगी। इसके साथ ही यहां रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे। इससे इस क्षेत्र का चहुंमुखी विकास होगा। 
-शमशेर सिंह बिष्ट, पीटीआर (सेनि) 

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