फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   kanwar yatra and lord shiva story

ससुर को दिया वचन निभाने के लिए सावन में कैलाश से उतरकर कनखल आते हैं भोले भंडारी, ये है पूरी कहानी...

Tue, 31 Jul 2018 06:11 PM IST
कौशल सिखौला , अमर उजाला, हरिद्वार
कौशल सिखौला , अमर उजाला, हरिद्वार Updated Tue, 31 Jul 2018 06:11 PM IST
विज्ञापन
kanwar yatra and lord shiva story
Lord Shiva - फोटो : File Photo

कांवड़ यात्राः ससुर को दिया वचन निभाने के लिए भगवान शिव शंकर सावन में कैलाश से उतरकर कनखल आते हैं। पढ़िए कांवड़ यात्रा से यह जुड़ी पूरी कहानी ..  

विज्ञापन


ब्रह्मापुत्र राजा दक्ष और सृष्टि नियंता भगवान शंकर के बीच भले ही जीवन भर साम्य न रहा हो, किंतु भोले भंडारी राजा दक्ष को दिया वचन निभाने के लिए कैलाश से उतकर सावन के पहले दिन कनखल नगरी आ गए हैं। एक महीने तक वे दक्ष मंदिर में स्वयं शिवत्व त्यागकर दक्षेश्वर बन गए हैं। उनके आने के साथ ही श्रावण की हर-हर और बम-बम प्रारंभ हो गई है। देश के कण-कण में महारुद्र के गीत गूंज उठे हैं।
विज्ञापन


भगवान शिव ने अपने ससुर राजा दक्ष को पुनर्जीवन देते हुए वचन दिया था कि वे श्रावण के महीने दक्ष की नगरी में दक्षेश्वर बनकर विराजेंगे। काल के आदिखंड में घटी उस घटना का वरदान भगवान आशुतोष आज तक निभा रहे हैं। भोलेनाथ को रिझाने के लिए देश भर से शिव भक्त उनकी गंगा नगरी पहुंचते हैं और गंगा जल से देश भर के शिवालयों में भगवान का अभिषेक करते हैं। कनखल नगरी ब्रह्मापुत्र राजा दक्ष प्रजापति की राजधानी थी। इस नगरी में भूतभावन दक्ष पुत्री सती को ब्याहने आए थे। पुत्री प्रेम में फंसे दक्ष ने अनिच्छा से अपनी पुत्री के साथ शिव का विवाह किया। 

विज्ञापन
विज्ञापन

kanwar yatra and lord shiva story
Lord Shiva

वास्तव में राजा दक्ष ब्रह्मा के इकलौते पुत्र होने के कारण बड़े अभिमानी थे। एक बार जब वे अपने पिता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के दरबार में पहुंचे तो उनके सम्मान में सभी देव उठ खड़े हुए थे।

भगवान शंकर अनादि देव होने के कारण ब्रह्मा और विष्णु के साथ बैठे रहे। यह दृश्य देखकर दक्ष ने शिव से बैर पाल लिया, जिसे उन्होंने जीवन पर्यन्त निभाया।

बाद में लंबे घटनाक्रम के बाद दक्ष के यज्ञ में उनकी पुत्री सती अपमान की अग्नि में दग्ध हो गई। तब शिव गण वीरभद्र ने क्रुद्ध होकर दक्ष की गर्दन काट दी। देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने उनके कटे धड़ पर बकरे का सिर जोड़कर जीवनदान दिया। पुनर्जीवित हुए दक्ष का सारा अहंकार जाता रहा। उन्होंने सृष्टि के अनादि देव भगवान शिव से वचन लिया कि वे दक्षेश्वर बनकर श्रावण के महीने में हर वर्ष कनखल आएंगे।  

kanwar yatra and lord shiva story
lord shiva

दक्ष को दिया वही वचन निभाने के लिए नीलकंठ भगवान सदियों से सावन में कनखल आते हैं। उनके आते ही उनकी ससुराल में रोनक प्रारंभ हो जाती है।

कहीं शंख-घरनावल बजेते हैं तो कहीं भोले-भंडारी के भजन गाए जाते हैं। हरिद्वार में हर-हर महादेव और बम-बम महादेव का जयघोष प्रारंभ हो जाते हैं। कहावत है कि श्रावण मास में हर कंकर शंकर में बदल जाता है। 

इसी नगरी से इसी श्रावण में भगवान परशुराम जलाभिषेक के लिए पाषाण लेकर गए थे। करोड़ों शिव भक्त इस पूरे महीने कनखल के साथ-साथ देश के शिवालयों में जलाभिषेक करेंगे। कांवड़ यात्रा के साथ अनेक धर्मयात्राएं पूरे देश में शुरु हो गई हैं। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed