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India-Pak Tension: 88 वर्षीय जोगेश्वरी को याद आए युद्ध के वो 'काले' दिन, बोलीं-बस यही दुआ थी कि जान बच जाए

Mon, 12 May 2025 04:44 PM IST
alka tyagi अलका त्यागी
Updated Mon, 12 May 2025 04:44 PM IST
सार

India-Pakistan Tension: हमारे सामने ही कई लोगों को मौत के घाट उतारा जा चुका था। हमारा घर फूस का था, जिनके घर की छत टिन की थी, दंगइयों से बचने के लिए हम उनके यहां छिपने चले जाते थे।

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India-Pakistan Tension Hearing news of war like conditions 88 year old Jogeshwari remember those dark days
जोगेश्वरी देवी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उस वक्त मैं 10 साल की थी। भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हो रहा था... हर तरफ दंगे मार-पीट, अगजनी देखने को मिलती थी। हर सयम यही डर लगा रहता था कि कोई आकर मार न दे... हमारे सामने ही कई लोगों को मौत के घाट उतारा जा चुका था। हमारा घर फूस का था, जिनके घर की छत टिन की थी, दंगइयों से बचने के लिए हम उनके यहां छिपने चले जाते थे।

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यह कहना है 88 वर्षीय जोगेश्वरी देवी का। उस वक्त देहरादून में ही फुलसनी में रह रहीं जोगेश्वरी भले ही 10 साल की थीं, लेकिन उन्हें काफी कुछ याद है। जिसे बतात हुए वो भावुक हो जाती हैं। कहती हैं कि युद्ध के समय और बाद का जीवन आसान नहीं था।
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तब ठीक से लाइट नहीं थी, हम दीये जलाते थे। मगर कोई हमे देख न ले, इसलिए वो भी नहीं जला पाते थे। उस वक्त महंगाई बहुत बढ़ गई थी। राशन की दिक्कत थी। पानी नहीं मिलता था। कहीं जाना आना तो भूल ही गए थे। कपड़े तक ठीक से नहीं मिलते थे। हालांकि इन सबसे ज्यादा तो इसी बात की फ्रिक थी कि जान बची रहे...।
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1962, 1965 और 1971 का युद्ध भी देखा

भारत-पाकिस्तान के 1971 में हुए युद्ध के समय वह 34 साल की थीं। अब फिर से दोनों देशों के बीच तनातनी की खबरें सुनीं तो उन्हें वो वक्त याद आ गया। उन्होंने बताया कि उस वक्त उनके पति करमचंद फौज में थे। 1962 और 1965 का युद्ध वे लड़ चुके थे, लेकिन जब 1971 में दोबारा युद्ध छिड़ा तो उस वक्त डर का माहौल ज्यादा था। 71 के युद्ध के समय फौजी पति रिटायर होकर घर आ चुके थे, लिहाजा वो बचने के लिए हमें व पड़ोसियों को निर्देशित करते थे, सब उनकी सुनते थे।

हर तरफ बस सायरन की आवाज आती थी। आवाज सुनते ही हम भागकर कमरों में छिप जाते थे। सरकार की तरफ से भी कोई खास राहत नहीं मिलती थी तब। बड़ी-बड़ी टोपियां पहनकर पुलिस वाले आते थे। वे डंडे मारकर घरों में खदेड़ देते थे। अचानक से छिप जाओ...छिप जाओ की आवाज आती थी तो हम भागकर घरों में छिप जाते थे। सरकार की तरफ से निर्देश आते थे कि रोशनी ना करें, धुंआ नहीं करना है।

घरों के अंदर ही रहो... तब हम सब एक साथ ही एक कमरे में रहते थे। कुछ पता नहीं था कि बचेंगे या नहीं। बस डर-डर कर समय काटते थे। किसी के शहीद होने की खबर आती थी तो मन कांप उठता था। हर तरफ चीत्कार थी बस। डर के माहौल के बीच बस यही दुआ करते थे कि किसी तरह हम बच जाएं, हमारा देश जीत जाए और इन हालातों से मुक्ति मिल जाए। जब भारत के जीतने की खबर सुनीं तो हम खुश भी थे और आंखों में आंसू भी थे।

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