भारत-चीन युद्ध के समय सीमांत में प्रचलित था ‘चाऊ माऊ सावधान जाग उठा हिंदुस्तान’
- 1962 में सड़क नहीं होने से सेना के जवानों ने पैदल ही पहुंचाई थी रसद
- सीमांत के लोगों ने भी भेड़ों पर लादकर सीमा पर पहुंचाए थे हथियार
- एसएसबी के अधिकारियों ने सीमान्त के लोगों को 45 दिनों तक हथियार चलाने का ट्रेनिंग दी थी
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भारत-चीन 1962 युद्ध के दौरान व्यास और दारमा घाटी में युद्ध जैसे हालात नहीं थे, लेकिन लोगों में चिंता का माहौल जरूर था। उस दौर में दोनों घाटी के सैकड़ों युवाओं, महिलाओं ने बकरियों, घोड़ों और खच्चरों के सहारे सीमा पर सेना को हथियार और रसद पहुंचाई थी। लोगो ने अपने मकानों में ‘ चाऊ माऊ सावधान, जाग उठा हिंदुस्तान’ जैसे नारे लिखकर चीन के प्रति अपना विरोध भी जताया था।
युद्ध छिड़ने की खबर के बाद देश की सेना व्यास और दारमा घाटी में पहुंचने लगी थी। सीमा की सुरक्षा मुस्तैदी से कर रही थी। उस समय सीमांत सड़क नही होने से सेना को पैदल ही अपने रसद और हथियार पहुंचाना काफी कठिन हो रहा था। ऐसे में प्रशासन के आह्वान पर दोनों घाटी के सैकड़ों लोग रसद और हथियार सीमा तक पहुंचाने के लिए सेना की मदद को आगे आए थे।
युद्ध के दौरान 20 से 25 वर्ष के रहे गर्ब्यांग निवासी दीवान सिंह गर्ब्याल और राजेंद्र सिंह गर्ब्याल बताते हैं कि उन्होंने स्वयं और उनके गांव के लगभग 50 से ज्यादा युवाओं और युवतियों ने गर्ब्यांग से नीचे की और छियालेख मालपा जिप्ति आदि जगहों पर आकर सेनाओं के रसद ,हथियार और अन्य सामग्री कंधों पर लादकर गर्ब्यांग गांव तक पहुंचाया।
नपलच्यू निवासी 80 वर्षीय गोपाल सिंह नपलच्याल और उनकी धर्मपत्नी लालमती देवी उम्र 70 वर्षीय बताते हैं कि युद्ध के दौरान वो लोग धारचूला में ही थे तो उन्होंने अपने बकरियों पर लादकर सेना के हथियार और रसद धारचूला से खेला गांव तक पहुंचाया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री के एक आह्वान पर दारमा,व्यास और चौदास घाटी के नागरिकों ने रुपये पैसे के साथ चांदी और सोने के जेवरात भी सरकार को दिए थे।
भारत चीन युद्ध के समय दारमा घाटी के लोगो ने अपने अपने मकानों में ‘चाऊ माऊ सावधान, जाग उठा हिंदुस्तान’ आदि नारे लिखकर अपना विरोध जताते थे। वर्तमान में समाजसेवी शकुंतला दताल के मकान में ये नारे लिखे हैं।
चिंता थी लेकिन देश सर्वोपरि
परिवार के बुजुर्ग बताते थे कि उस युद्ध के समय कुटी गांव में खेती का कार्य पूरा हो चुका था। गांव में फसल पक गई थी। लोगों में काफी भय का माहौल था। बुजुर्गों ने आपस में वार्तालाप करके जो होगा देखा जाएगा सोचकर फसल की कटाई की। इसके बाद निचली घाटी में वापस लौट आए। अन्य गांव के लोगों ने युद्ध का माहौल देखते हुए अपने-अपने सामानों को बांधकर कुछ पड़ावों में पहुंचाना भी शुरू कर दिया थाः-सत्यवान सिंह कुटियाल, कुटी निवासी
- हथियार चलाने की मिली थी ट्रेनिंग
सीमांत के लोगों ने युद्ध के समय हर प्रकार के सहयोग देने के बाद 1965 से 1970 के बीच सिविल एसएसबी के अधिकारियों ने सीमान्त के लोगों को 45 दिनों तक हथियार चलाने का ट्रेनिंग दी थी। मैंने और मेरे मित्र शेर सिंह ग्वाल, स्व जगत सिंह ग्वाल और महेन्द्र दताल के अलावा कई महिलाओं ने भी ट्रेनिंग ली थी। सीमा पर जाने वाले जवानों को सलामी देते समय गर्व की अनुभूति होती थीः- फल सिंह बोनाल, सेवानिवृत्त इंजीनियर दारमा
- लोकनृत्य के द्वारा बढ़ाया मनोबल
1962 युद्ध के समय सीमांत के गुंजी,नपलचु, नाबी और रोंकांग के रं समाज के लोगों ने सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए गांव से करीब एक किलोमीटर दूर मनीला तक अपने पारंपरिक वेशभूषा और रंगा पहनकर ढाल, तलवार और बाजे के साथ लोकनृत्य किया था। इसके अलावा रसद, हथियार और गोला-बारूद के साथ ही अन्य सामग्री भी विभिन्न पोस्टों में पहुंचाने में सहयोग कियाः-बिशन सिंह गुंज्याल, गुंजी निवासी