गलवां घाटी विवाद: चीन से जंग के अनुभव का लाभ देने को तैयार हैं 1962 की जंग लड़ने वाले रिटायर्ड कैप्टन प्रहलाद
- 79 साल के कैप्टन देऊ बोले-भारत की जमीं पर नजर रखने वाला चीन कभी भी भरोसेमंद नहीं रहा
- चीन से जंग के अनुभव का लाभ देने को तैयार हैं 79 साल के कैप्टन देऊ
- फौज में ट्रेनिंग लेने के एक माह के भीतर लड़ी थी 1962 की जंग
- तब चीन की एसएलआर का मुकाबला किया था थ्री-नॉट-थ्री बंदूक से
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गलवां घाटी में चीन की हिमाकत से शहीद हुए भारतीय सैनिकों की शहादत ने कैप्टन प्रहलाद सिंह देऊ (रिटायर) के भीतर के फौजी को फिर जगा दिया है। जंग के मैदान में 58 साल पुरानी स्मृति उनकी जेहन में ताजा हो उठी है।
साथ ही चीन की धोखा देने की पुरानी प्रवृत्ति भी उन्हें याद आई है। 1962 के जंग में बहादुरी से मोर्चा लेने वाले देऊ उम्र के चौथे पड़ाव के बावजूद युद्ध में दो-दो हाथ करने को तैयार हैं। अलबत्ता, कहते हैं कि अधिक उम्र की वजह से सरकार उन्हें सीमा पर जाने की इजाजत नहीं देगी लेकिन उनमें अब भी इतनी सामर्थ्य है कि वे अपने जवानों को अपने अनुभव का लाभ दे सकते हैं।
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वह कहते हैं कि हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे को दरकिनार कर हमलाकर पीठ पर छुरा घोंपने वाले चीन ने भारत पर जबरन युद्ध थोपा था। 20 अक्तूबर 1962 से 21 नवंबर 1962 तक चली जंग में हमने बहादुरी का परिचय दिया। कैप्टन प्रहलाद सिंह देऊ बताते हैं कि उन्होंने सितंबर 1962 में ही रानीखेत में ट्रेनिंग पूरी की थी। तभी युद्ध के बीच में 6 कुमाऊं के जवानों को अरुणाचल प्रदेश बुला लिया गया। सीमांत क्षेत्र वलांग में उनकी बटालियन ने मोर्चा संभाला।
कहते हैं कि तब भारत की आजादी को 15 साल ही हुए थे। हम उनकी एसएलआर (सेल्फ लोडेड रायफल) का मुकाबला थ्री-नॉट-थ्री बंदूक से कर रहे थे। हमने जमकर जवाब दिया। चीन की सैन्य टुकड़ी की तादाद ज्यादा थी। हमारे लिए अरुणाचल में जंग का यह मैदान नया था, मगर फिर भी हमारे साथी जवानों ने बहादुरी से लोहा लिया।
हमारे सैनिक लड़ते रहे और मरते रहे। 118 साथी जवानों ने शहादत दी थी और 351 जवानों को चीन ने बंदी बना लिया था, जिन्हें कुछ महीने बाद रिहा कर दिया गया। कैप्टन देऊ बताते हैं कि युद्ध के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सैनिकों के साथ खाना खाया और उनका हौसला बढ़ाया।
चीन के अलावा 1965 और 1971 के पाक युद्ध में भी हिस्सा ले चुके 79 साल के कैप्टन देऊ कहते हैं कि यह भारत 1962 का नहीं, 2020 का है। तब हम नए-नए आजाद हुए थे। हमारी सैन्य, आर्थिक व तकनीकी क्षमता काफी कम थी। पर अब हम परमाणु संपन्न होने के साथ ही सैन्य व आर्थिक रूप से अधिक ताकतवर हैं। वे कहते हैं कि धोखेबाज चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। उसका इतिहास और जमीन हड़पने की उसकी नीति इस बात की इजाजत नहीं देती है कि उस पर विश्वास करें।