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बाघों का रास्ता आदमी काट रहा, आदमी का बाघ नहीं

Thu, 09 Feb 2017 10:52 AM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 09 Feb 2017 10:52 AM IST
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human creat problem for tiger
tiger

बाघ, तेंदुआ, भालू का रास्ता आदमी काट रहा है। कभी वन्य जीव आदमी के रास्ते में नहीं आते हैं। 99 फीसदी मामलों में आदमी ही वन्य जीवों के रास्ते में आ जाता है। इसी से मानव-वन्य जीव संघर्ष बढ़ रहा है। यह बात विश्व के सबसे वरिष्ठ वन्य जीव विज्ञानी अमेरिका के डा. जॉर्ज शैलर (82) ने कही। उनका कहना है कि भारतीय संस्कृति में वन्य जीवों के सम्मान की अनूठी परंपरा है। इसे जीवित रखना चाहिए, ताकि प्रकृति से नजदीकी बनी रहे।

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अमेरिकी वन्य जीव विज्ञानी डॉ. जॉर्ज शैलर से बुधवार को भारतीय वन्य जीव संस्थान में अमर उजाला ने बातचीत की। यहां यह जानकारी देना जरूरी है कि उत्तराखंड के बाघों पर पहली बार वर्ष 1963 में डॉ शैलर ने शोध कार्य किया था। इसके साथ ही वह हिमालयी वन्य जीवों के भी विशेषज्ञ हैं। हिमालय में काम करने वाले वे दुनिया के वरिष्ठ विज्ञानियों में एक हैं। उत्तराखंड के बाघों से उनकी भावनात्मक निकटता है। उनका कहना है कि भारतीय प्राचीन ग्रंथों में वन्य जीवों के सम्मान की बहुत ही मजबूत परंपरा है।
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इसी से विश्व में सबसे अधिक बाघ भारत में हैं। 55 साल पहले की स्मृतियों में झांककर बताते हैं कि उस वक्त कुछ लोग बाघ के शिकार को शौर्य समझते थे, लेकिन तब भी समाज को लेकर वन्य जीवों में धारणा अलग रही है। उनका कहना है कि बाघ, तेंदुआ आदि के लिए ‘आदमखोर’ की संज्ञा प्रयोग करना, उसे घेरकर मार देना आदि ठीक नहीं है।
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वन्य जीव और नदी के बीच में जब आबादी हो जाएगी तो जाहिर है कि जानवर बस्तियों में आएंगे। उन्होंने वन्य जीवों को वासस्थलों के संरक्षण की जरूरत बताई। यह भी बताया कि चीन में सबसे अधिक वन्य जीवों के अंगों की खपत की जा रही है। इससे वन्य जीवों के शिकार जैसे अपराध को बढ़ावा मिल रहा है।

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