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दुर्लभ हिमालयी गिद्धों की जान पर ‘हाईटेंशन’

सतपाल चौधरी / अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 03 Apr 2015 01:33 PM IST
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himalayan vultures in danger.

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दुर्लभ हिमालयी गिद्धों की जान पर हाईटेंशन बिजली की तारों का खतरा मंडरा रहा है।
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देहरादून जिले के झाझरा क्षेत्र में तीन दिन के भीतर सात गिद्धों की करंट लगने से मौत हो चुकी है। वन विभाग की टीम ने मौके का निरीक्षण किया है। इस मामले पर शासन को जल्द रिपोर्ट देने की बात कही जा रही है।

हिमालयी गिद्ध हर साल बड़ी संख्या में अक्तूबर से अप्रैल महीने तक झाझरा रेंज के परवल गांव में आते हैं। पास ही टोंस नदी में फेंके जाने वाले पशुओं के शव इनका चारा बनते हैं। लेकिन, कुछ समय से झाझरा से गुजर रही हाईटेंशन लाइन इन गिद्धों के लिए खतरा बन गई है।


जानकारी के मुताबिक तीन दिन के भीतर यहां सात गिद्ध 33 हजार केवी की लाइन की चपेट में आकर मारे जा चुके हैं। वन अधिकारियों ने भी इसकी पुष्टि की है।

दो साल में मरे 50 गिद्ध
गिद्धों के प्रवास के दौरान वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) विवि में एमएससी, बीएससी फारेस्ट्री कर रहे छात्र अक्सर परवल गांव में अध्ययन के लिए जाते हैं। छात्र अंकित शर्मा और अक्षय जैन की मानें तो दो साल में यहां कम से कम 50 गिद्ध इसी तरह हाईटेंशन लाइन की चपेट में आकर मारे गए हैं।

यह है हिमालयी गिद्ध
हिमालयी गिद्ध चीन सीमा से लगते भारत के राज्यों और तिब्बत में पाई जाने वाली दुर्लभ प्रजाति है। इन्हें हिमालयन ग्रिफन गिद्ध भी कहा जाता है। हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली पक्षी प्रजातियों में यह गिद्ध आकार और वजन में सबसे बड़ा होता है।

सूक्ष्म कीड़ों से लेकर बड़े स्तनपायी पशुओं के शव तक खाने वाला यह पक्षी प्रकृति का स्वच्छकार माना जाता है। 1980 में भारत में इन गिद्धों की संख्या जहां 80 लाख थी, अब ये कुछ हजार ही बचे हैं।

दवा बन गई थी जहर
पशुओं के उपचार में उपयोग की जाने वाल दवा डाइक्लोफिनेक गिद्धों की घटती संख्या की वजह बनी। दरअसल, गिद्ध मृत पशुओं का मांस खाते हैं।

जिन पशुओं को इस दवा के इंजेक्शन लगाए जाते थे, उनमें इसका असर मौत के बाद भी रहता था। ऐसे पशुओं के शव खाने पर यह दवा गिद्धों में पहुंच जाती थी और वे मर जाते थे। हालांकि, वर्ष 2006 में यह दवा प्रतिबंधित कर दी गई।

गिद्धों की मौत की जानकारी मिली है। विभाग के अधिकारियों की एक टीम को मौके पर भेजा गया है। मारे गए गिद्धों के शव के सैंपल ले लिए गए हैं। इन्हें भारतीय वन्यजीव संस्थान भेज दिया है। अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। जांच से ही साफ होगा कि मौत की वजह क्या है। नदी में जानवरों के जो शव फेंके जाते हैं, उनकी भी जांच होगी। यहां कौन लोग शव फेंक रहे हैं, उन्हें भी चिह्नित किया जा रहा है। इसकी रिपोर्ट शासन को भी देंगे।
- सुशांत पटनायक, प्रभागीय वन अधिकारी

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