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Himalaya Diwas: आपदाओं को न्यौता दे रही हिमालयी क्षेत्र की कटोरानुमा आकृति, पढ़ें ये खास रिपोर्ट

Fri, 09 Sep 2022 05:53 PM IST
अलका त्यागी अंकित कुमार गर्ग, अमर उजाला, रुड़की
अंकित कुमार गर्ग, अमर उजाला, रुड़की Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 09 Sep 2022 05:53 PM IST
सार

रुड़की स्थित राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) ने डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, भारत सरकार के प्रोजेक्ट नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग द हिमालयन ईको सिस्टम के तहत 11 घटकों पर शोध किया है।

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Himalaya Diwas 2022: Topography elevation of the Himalayan region inviting disasters
हिमालय - फोटो : Pixabay

विस्तार

उत्तराखंड में ऋषिकेश से लेकर ऊपर की तरफ हिमालयी क्षेत्र का टोपोग्राफी एलिवेशन (स्थलाकृति ऊंचाई) कटोरानुमा आकृति में है। जो एक खास क्षेत्र में बादल फटने और अतिवृष्टि जैसी आपदाओं को न्यौता दे रहा है। एक शोध में यह बात भी सामने आई है कि हिमालयी क्षेत्र के अपर गंगा बेसिन (यूजीबी) में पिछले 10 सालों में मानसूनी सीजन में बादल फटने और अतिवृष्टि की 57 घटनाएं हुईं। इनमें भी सबसे अधिक 38 घटनाएं हिमालयी क्षेत्र के 1000 से 2000 मीटर के एलिवेशन बैंड (समुद्र तल से ऊंचाई) में हुई हैं। जो इस ऊंचाई वाले बैंड में बसे करीब 3000 हजार गांवों को संवेदन और अतिसंवेदनशील बना रही है। ऐसे में इस क्षेत्र में एहतियाती कदम उठाए जाने जरूरी हैं। 

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रुड़की स्थित राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) ने डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, भारत सरकार के प्रोजेक्ट नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग द हिमालयन ईको सिस्टम के तहत 11 घटकों पर शोध किया है। इसके तहत किए गए टोपोग्राफी एनालिसिस में हिमालय के अपर गंगा बेसिन (यूजीबी) की आकृति कटोरे की भांति उभरकर सामने आई है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस आकृति के कारण यहां बनने वाला मानसून का प्रभाव आगे नहीं बढ़ पाता और घाटियों में अधिक तापमान के चलते बादल और पानी का घनत्व ऊपर जाकर बढ़ जाता है।
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इसके परिणामस्वरूप खास जगहों पर अतिवृष्टि और बादल फटने की घटनाओं की पुनरावृत्ति हो रही है। वैज्ञानिकों ने शोध में 2010 से 2020 के बीच हुई 57 बादल फटने और अतिवृष्टि की घटनाओं के आधार पर जोखिम और खतरे की जद में आए जिले और ब्लॉक को भी चिह्नित किया है। प्रोजेक्ट के कोआर्डिनेट डॉ. एमके गोयल, डॉ. मनोहर अरोड़ा, डॉ. पीके मिश्रा, डॉ. संजय जैन और डॉ. एके लोहानी ने बताया कि इस शोध का मुख्य उद्देश्य जोखिम भरे स्थानों की पहचान करना था ताकि इन जगहों पर आपदाओं से पहले और बाद में किए जाने वाले उपायों को अमल में लाया जा सके। 

इन जगहों को जोखिम के रूप में किया गया है चिह्नित

जोखिम भरे जिलों में चमोली, टिहरी गढ़वाल और रुद्रप्रयाग को चिह्नित किया गया है, जबकि इनमें पड़ने वाले जोखिम भरे ब्लॉक में जोशीमठ, भिलंगना, भटवाड़ी, ऊखीमठ, दशोली, देवप्रयाग, जखोली, थराली और नारायणबगड़ शामिल हैं। 

18 से 28 डिग्री सतही तापमान वाले क्षेत्रों में फटे 80 फीसदी बादल 

आमतौर पर यह समझा जाता है कि जहां बारिश कम होगी, वहां अतिवृष्टि या बादल फटने जैसी घटनाओं की संभावनाएं नहीं होंगी लेकिन अपर गंगा बेसिन में ऐसा नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में कम बारिश वाले क्षेत्रों में धरती के सतही तापमान और टोपोग्राफी एलीवेशन के चलते बनने वाले रीजनल लॉकिंग सिस्टम के कारण बादल फटने और अतिवृष्टि की घटनाएं अधिक होती हैं। शोध में भी यह बात सामने आई है। 

राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान के वैैज्ञानिक डॉ. पीके मिश्रा ने बताया कि शोध के दौरान यह पाया गया कि मानसूनी सीजन में जुलाई और अगस्त माह में धरती के 18 से 28 डिग्री सतही तापमान वाले स्थानों पर 80 प्रतिशत बादल फटने की घटनाएं हुई हैं, जबकि तीन से 17 डिग्री वाले स्थानों पर इन घटनाओं की संख्या 20 प्रतिशत है। जो यह दर्शाता है कि घाटियों में जहां बारिश कम है और सतही तापमान अधिक है, वहां बादल फटने और अतिवृष्टि के लिए अनुकूल सिस्टम निर्मित होता है। वहीं, टोपोग्राफी एलीवेशन की आकृति के चलते भी बादल फटने जैसी घटना के लिए रीजनल लॉकिंग सिस्टम बन जाता है। इसी कारण अपर गंगा बेसिन में पिछले 10 सालों में छह जिलों हुई 57 घटनाएं हुई हैं। इसमें बादल फटने की घटनाएं 29 हैं। इनमें भी सबसे अधिक छह घटनाएं चमोली जिले में दर्ज की गई हैं। 


घाटियों में पहाड़ियों के आमने सामने के रिफ्लेक्शन से भी बढ़ता है तापमान

हिमालयी क्षेत्रों में गहराई के साथ अधिक ऊंचाई वाली घाटियों में मानसूनी प्रभाव विभिन्न तरह के होते हैं। इनमें तापमान बढ़ता है तो कई मानसूनी परिवर्तन सामने आने लगते हैं। तथ्यों के अनुसार घाटियों में तापमान अधिक होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका एक प्रमुख कारण रिफलेक्शन भी है। डॉ. पीके मिश्रा ने बताया कि घाटियों में पहाड़ियों की दीवारें एक दूसरे को सामने से रिफलेक्ट करती हैं, जिससे तापमान में वृद्धि होती है। इस बढ़े हुए तापमान का मौसम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई ऐसे हिस्सों में अक्सर दोपहर बाद मौसम खराब हो जाता है। ऐसे में इस तरह की चिह्नित जगहों पर अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। 

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