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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Himalaya Diwas 2022 : Important facts about Himalaya Sankalp Abhiyan samvad program in Amar Ujala

Save Himalaya: संवाद के मंथन से निकला पंचामृत, हिमालय इंटेलीजेंस को विकसित करने की उठी आवाज

Fri, 09 Sep 2022 12:18 AM IST
अलका त्यागी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 09 Sep 2022 12:18 AM IST
सार

हिमालय में बढ़ते तापमान, सिमटती खेती,  सिकुड़ते ग्लेशियर और अस्तित्व खोती नदियों को बचाने के लिए साझा प्रयासों की आवश्यकता है। जल, जंगल जमीन, वायु के लिए विज्ञानियों, पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनसमुदाय को साझा प्रयास करने होंगे।

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Himalaya Diwas 2022 : Important facts about Himalaya Sankalp Abhiyan samvad program in Amar Ujala
अमर उजाला कार्यालय में हिमालय बचाओ अभियान के तहत कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमालय को बचाने के लिए सबसे पहले हिमालय को समझना होगा। इसके लिए हिमालय इंटेलीजेंस को विकसित करने की आवश्यकता है। हिमालय में उन खरपतवारों और प्रजातियों की पहचान कर उनसे छुटकारा पाना होगा, जो वहां की वनस्पति और खेती पर कहर बरपा रही हैं। लैंटाना और गाजर घास या चीड़ के वनों से छुटकारा पाना होगा।

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Save Himalaya: वैज्ञानिकों व जनता के सुझावों से तैयार होगा हिमालय चार्टर, संवाद में प्रबुद्धजनो ने बनाई राय
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हिमालय में बढ़ते तापमान, सिमटती खेती,  सिकुड़ते ग्लेशियर और अस्तित्व खोती नदियों को बचाने के लिए साझा प्रयासों की आवश्यकता है। जल, जंगल जमीन, वायु के लिए विज्ञानियों, पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनसमुदाय को साझा प्रयास करने होंगे। ऐसे अनुसंधानों और प्रयोगों पर काम करना होगा जो प्रकृति के अंधाधुंध दोहन रोकने और नए और सहज विकल्पों के रूप में काम आएं। अमर उजाला के हिमालय बचाओ अभियान विषय पर हुए संवाद में आए विज्ञानियों, पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक सुर में एकजुट पहल करने की आवश्यकता बल दिया। 

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संवाद के मंथन से निकला पंचामृत

1. चीड़ हटाओ, बांज लाओ: संवाद में यह चिंता उभरी कि हिमालय क्षेत्र में चीड़ धरती को बंजर कर रहा है। बांज, देवदार, बुरांश, कैल सरीखी उपयोगी प्रजाति के वृक्षों के अस्तित्व के लिए वह संकट बना है। सरकार को चीड़ हटाओ, बांज-देवदार लाओ अभियान चलाना चाहिए। चीड़ वृक्षों को काटने की अनुमति हो और उनके स्थान पर चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों का जंगल उगाना चाहिए। चीड़ की लकड़ी का उपयोग उच्च हिमालयी क्षेत्रों में घर बनाने के लिए करना चाहिए।


2.घास को बनाएंगे खास: लैंटाना, गाजर घास हिमालय क्षेत्र में खेती को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। उत्तराखंड के जंगलों व राष्ट्रीय उद्यानों में यह तेजी से फैल रहा है। खेती और चारागाहों को बचाने के लिए लैंटाना और गाजर घास से मुक्ति दिलानी होगी। घास के नए मैदान विकसित करने हैं। जैविक खेती को बढ़ावा देना है।

3.हिमालयन इंटेलीजेंस: हिमालय के प्रति एक मानस बनाने की जरूरत है। जनमानस में हिमालयन इंटेलीजेंस विकसित करना होगा। यह समझ बनानी होगी कि वास्तव में हिमालय क्या है, उसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव है। 

4.लैब टू लैंड: देश-दुनिया के नामी संस्थान अपने-अपने क्षेत्रों में हिमालय के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन ये काम अपने-अपने संस्थानों में सिमट कर रह जा रहे हैं। प्रयोगशाला में सीमित हो चुके इन कार्यों को जमीन पर उतारने की जरूरत है। लैब टू लैंड अभियान चलाने का समय आ चुका है।

5.पहाड़ की मिट्टी पहाड़ में: हिमालय से करोड़ों टन उपाजऊ मिट्टी कटाव हो रहा है। इसे रोकने की नीति बनानी है। पानी के संकट से उत्तराखंड में जो खेती महज आठ प्रतिशत तक सिमटी है, उसे सिंचाई के नए उपयोगी संसाधन से 40 फीसदी तक पहुंचाना है।

हिमालय दिवस से निकली आवाज का लिया जाने लगा संज्ञान: डॉ. अनिल जोशी 

पर्यावरणविद पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि वर्ष 2010 में स्व. सुंदरलाल बहुगुणा की उपस्थिति में उत्तराखंड और दिल्ली के साथियों की एक बैठक में नौ सितंबर को हिमालय दिवस मनाए जाने की बुनियाद रखी गई थी। उन्होंने कहा कि आज हिमालय दिवस से निकली आवाज का संज्ञान लिया जाने लगा है। हिमालय दिवस की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि इस पर काफी गंभीर मंथन के बाद निर्णय हुआ था कि उत्तराखंड और हिमालय के अन्य भागों में जहां-जहां पर लोग हिमालय बचाने के लिए रचनात्मक कार्यक्रम व आंदोलन चला रहे हैं। वहां पर जाकर उनका सहयोग किया जाए। उनके बारे में लिखा जाए और हिमालय दिवस के दिन इसको उदाहरण बनाकर प्रदर्शित किया जाए। साथ ही रैलियां और सम्मेलन आयोजित किए जाएं। ताकि लोगों की आवाज को सामूहिक ताकत मिले और हिमालय दिवस के माध्यम से सरकार तक जनता की बात को पहुंचाया जा सके। 

उन्होंने कहा कि इसका लाभ होता भी दिख रहा है। हमारी आवाज का नीतिकारों ने संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा कि शुरुआत अच्छी हुई, लेकिन हिमालय के प्रति लोगों को अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। हिमालय उत्तराखंड ही नहीं देश की पारिस्थितिकी का भी केंद्र है। आज यूरोप के कई देशों में तापमान 40 से 45 डिग्री सेंटिग्रेट तक पहुंच गया है। हमारे यहां ऐसी स्थिति न हो, इस पर अभी से विचार करना होगा। जल, जंगल की जो संपदा हमारे पास है उसे संजो कर रखना होगा। उन्होंने कहा कि जब जल, जंगल बने थे तब हम नहीं थे। हमसे कहीं न कहीं प्रकृति के विज्ञान को समझने में चूक हुई है।

ईश्वर ने भी हिमालय को अपना निवास बनाया

डॉ. जोशी ने कहा कि हिमालय आदिकाल से ही देश दुनिया में जाना जाता रहा है। हमारे वेद पुराणों या कोई भी धर्म की पुस्तक हो, उनमें हमेशा से ही हिमालय का किसी न किसी रूप में उल्लेख है। साधु-संतों से लेकर ईश्वर तक ने हमेशा हिमालय को ही अपना निवास बनाया। चाहे भगवान बदरीनाथ हों या अन्य देवी-देवता सबके लिए हिमालय ही एक ऐसी स्थली रही, जो इनको सबसे अधिक प्रिय है।

हिमालय के संरक्षण के लिए जो भी बेहतर होगा, फैसला लेने में पीछे नहीं हटेंगे: सुबोध

वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि प्रदेश के विकास और हिमालय के संरक्षण के लिए जो भी बेहतर होगा, हम फैसला लेने में पीछे नहीं हटेंगे। बतौर वन मंत्री वह विभाग में सौ से अधिक बदलाव करने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि संवाद में निकले मुख्य बिंदुओं को सरकार अपनी नीतियों में शामिल करेगी।

बृहस्पतिवार को पटेलनगर स्थित अमर उजाला कार्यालय में हिमालय दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित संवाद कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि हिमालय का किसी राज्य व देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्व है। इसलिए इसके संरक्षण का दायित्व भी सभी का है। उन्होंने कहा कि हिमालय के बचाव के साथ व्यवहारिकता के पक्ष को भी ध्यान में रखना है। पहले आम आदमी की आजीविका वनों से जुड़ी थी, तब वन सुरक्षित थे। हमें पुन: आम आदमी को वनों से जोड़ना होगा। सरकार इस दिशा में काम कर रही है।

वन मंत्री ने कहा कि हमने इस बार पौधरोपण की नीति में बदलाव किया है। जंगल और इसके आसपास की खाली जमीन पर फलदार पौधे रोपे जा रहे हैं। कोशिश यह है कि छोटे जानवरों को जंगल में ही पर्याप्त भोजन मिल जाए। फिर वह आबादी क्षेत्र में नहीं आएंगे। इससे बड़े जंगली जानवरों का भी आबादी क्षेत्र में आना रुक जाएगा। इसके तहत हम लंबी अवधि की योजना पर काम कर रहे हैं। 

वन पंचायतों को बनाएंगे सशक्त 

वन मंत्री ने कहा कि सरकार वन पंचायतों को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रही है। उन्हें वनोपज से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए वह 13 सितंबर को एक बैठक आयोजित करने जा रहे हैं।

लैब टू लैंड की पैरवी की, वैज्ञानिक संस्थाओं से मिलकर करेंगे बात

वन मंत्री उनियाल ने लैब टू लैंड की पैरवी की। उन्होंने कहा कि आमतौर पर देखने में आता है कि हमारे यहां तमाम वैज्ञानिक संस्थानों में शोध तो होते हैं, लेकिन वह रिजल्ट धरातल पर नहीं पहुंच पाते हैं। उन्होंने कहा कि वह शीघ्र ही देहरादून में स्थित पांच वैज्ञानिक संस्थानों के साथ बैठकर इस संबंध में बातचीत करेंगे। ताकि वैज्ञानिकों की लैब में होने वाले शोध के परिणामों को धरातल पर उतारा जा सके। वन मंत्री ने समान प्रवृति के विभागों के एकीकरण की भी पैरवी की।

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