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हजरत इमाम हुसैन की याद में गम में डूबा शिया समुदाय
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 04 Oct 2016 04:08 PM IST
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हज़रत मुहम्मद साहब के नाती हज़रत इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों को ईराक के कर्बला शहर में उस समय के खलीफ़ा और शासक, यजीद की फौज ने कत्ल कर डाला था।
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1400 साल पहले हुई इस घटना की याद में दुनिया भर के शिया समुदाय के लोग गम और मातम में डूब जाते हैं। अरब के मैदान पर हुई इस शहादत के गम को याद करने के लिए देहरादून के इमामबाड़ों में मजलिसों, मातम और अजादारी का सिलसिला शुरू हो गया है। जो मुहर्रम की दस तारीख़ तक होगा।
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शिया समुदाय बाहुल्य मोहल्लों में रात-रात भर जाग कर लोग मातम मना रहे हैं। आज है मुहर्रम का दूसरा दिन है। ईसी रोड और इनामुल्लाह बिल्डिंग के अजाखानों में मजलिसें हुई। जिनमें इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का किस्सा सुनकर लोगों की आंखें नम हो गई।
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ईसी रोड स्तिथ अजाखाने में मौलाना असगर ने कहा कि मुहर्रम अन्याय और क्रूरता के ख़िलाफ़ न्याय और सत्यता का प्रतीक पर्व है। महात्मा गांधी तक ने इमाम हुसैन की इच्छाशक्ति और न्यायप्रियता का उल्लेख किया है। चूंकि मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को कर्बला के मैदान पर क्रूर और जालिम शासक यजीद ने धोखे से इमाम हुसैन समेत कुल 71 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था तो उसी की याद में पूरे दस दिनों तक गम का आलम रहेगा। आज दूसरा दिन है, इस दिन इमाम हुसैन ने कर्बला शहर में प्रवेश किया था।
इनामुल्लाह बिल्डिंग स्तिथ इमामबाड़े में मौलाना मंजर सादिक ने मजलिस पढ़कर कहा कि सीरिया का शासक यजीद पूरी दुनिया में अपना राज कायम करना चाहता था। जैसे ही वह शासक बना उसने इमाम हुसैन से अपनी अधीनता स्वीकारने के लिए कहा। यजीद की गुलामी को नकारकर इमाम हुसैन ने खुलेआम उसकी सत्ता को चुनौती दे दी थी।
इन हालात में इमाम हुसैन का मदीना में रह पाना बहुत मुश्किल हो गया, वे अपने लोगों के साथ मक्का की तरफ निकल पड़े लेकिन वहां भी यजीद की सेना ने उन्हें रहने नहीं दिया। अंत में ईराक के कर्बला मैदान में उन्हें घेरकर धोखे से मार दिया गया।
एजुकेशनल और वेलफेयर सोसायटी के सचिव हसन जैदी ने बताया कि यौम ए आशूरा तक मजलिसों में कर्बला के उस मंज़र को मौखिक रूप से सुनाया जाता है जिसमें इमाम हुसैन को शहीद किया गया था