हरीश के आते ही खुलने लगी गठबंधन की गांठे

अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 02 Feb 2014 11:09 AM IST
harish rawat mla dispute
कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन के बाद निर्दलियों और सहयोगी दलों के गठबंधन पीडीएफ की कमजोर गांठे खुलने लगी हैं।

पीडीएफ बना प्रेशर ग्रुप
पूर्व सीएम विजय बहुगुणा के कार्यकाल में अपने विधायकों से अधिक पीडीएफ ने उनके लिए प्रेशर ग्रुप का काम किया है। एक दिखने वाली पीडीएफ पहली बार फ्रंट नहीं बल्कि पुराने रिश्तों के चलते बंटा हुआ दिखा।

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निर्दलीय विधायकों की कांग्रेस से पुरानी आस्था का ही नतीजा है कि गठबंधन का सातवां सिरा हरीश रावत के सीएम बनते ही खुल गया है।

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बसपा के तीन विधायकों, उक्रांद एक विधायक और तीन निर्दलियों से मिलकर बने पीडीएफ में ध्रूवीकरण शुरू होता दिख रहा है। मंत्री प्रसाद नैथानी को सतपाल महाराज और हरीश दुर्गापाल को इंदिरा हृदेयश का नजदीकी माना जाता है।

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बसपा के पास तीन विधायकों का संख्या बल है। उक्रांद विधायक प्रीतम सिंह पंवार दो बार के विधायक हैं, लेकिन उनकी पीडीएफ में अहम भूमिका है। ऐसे में निर्दलीय विधायक दिनेश धनै सबसे कमजोर कड़ी साबित हुए।

सतपाल और इंदिरा को नाराज करना ठीक नहीं

धनै को कैबिनेट मंत्री की कुर्सी के कांग्रेस से कम और पीडीएफ के एके पर विश्वास था, लेकिन अपनी अपनी कुर्सी सुरक्षित रखने के लिए पीडीएफ ने धनै को हाशिये पर ला दिया।

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इसके अलावा सीएम हरीश रावत बेहतर तरीके से समझते हैं कि सतपाल और इंदिरा को नाराज करना फिलहाल उनकी राजनीतिक सेहत के लिए ठीक नहीं है।

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वहीं बसपा के तीन विधायकों का संख्याबल और उक्रांद का एक विधायक भविष्य में सीएम हरीश को बहुमत की राजनीति में काम देगा। टिहरी विधायक धनै के पास कांग्रेस में कोई बड़ा आका न होने के साथ हरीश के करीबी किशोर उपाध्याय का प्रतिद्वंदी होने का खामियाजा भी झेलना पड़ा।

आंकड़ों का खेल बांट रहा पीडीएफ को
दिनेश धनै के पीडीएफ छोड़ने से पड़ी दरार सीएम हरीश रावत के लिए फायदे का सौदा है। 33 विधायकों वाली कांग्रेस को बहुमत के लिए 36 विधायक चाहिए।

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अगर हरीश भाजपा विधायक से सीट खाली करवा कर विधानसभा चुनाव जीतते हैं तो पार्टी जादुई आंकड़े से दो सीटें दूर होगी। ऐसे में पीडीएफ जितना कमजोर होगा रावत को उसका लाभ मिलेगा। निर्दलीयों या फिर बसपा से किसी एक का समर्थन भी हरीश की सरकार को सुरक्षित रख सकता है।

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