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गढ़वाल-कुमाऊं को एक इकाई के रूप में देखें: सीएम रावत
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 28 Aug 2016 05:32 PM IST
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लोगों के सवालों को सीएम तक पहुंचाने और उनके जवाब पाने का यह सिलसिला आज समाप्त हो रहा है। इस शृंखला में हमने बुधवार तक प्राप्त सवाल ही शामिल किए हैं।
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हमने इस शृंखला में व्यक्तिगत सवालों और उन कई सवालों को शामिल नहीं किया जिनके जवाब हमें सीएम से नहीं मिले हैं। हम एक ठहराव के बाद फिर ऐसा ही प्रयास करेंगे। उस प्रयास में हम उन सवालों को जरूर शामिल करने की कोशिश करेंगे जो बुधवार के बाद पाठकों ने हमें भेजे हैं।
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पाठकों से हम नए सवाल भी आमंत्रित करेंगे। इस कॉलम के तहत अगली मुलाकात के लिए हम इस उम्मीद के साथ विराम ले रहे हैं कि सीएम के सामने आमजन की जो भी समस्याएं पहुंची हैं, उनका कुछ न कुछ निदान हो।
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महेश्वर प्रसाद पुरोहित, रुद्रप्रयाग : उपनल के जरिये तैनात जो संविदा कर्मी हटाए गए थे उन्हें कुमाऊं भेज दिया गया। क्या उन्हें गढ़वाल में ही नियुक्ति नहीं दी जानी चाहिए। इसके अलावा रुद्रप्रयाग से चाय बोर्ड का दफ्तर कुमाऊं क्यों शिफ्ट किया गया?
- कुछ जटिलताएं राज्य बनने के बाद ढांचा नहीं होने के कारण हुई हैं। इसे गंभीरता से लिया गया है। सुधार कर रहे हैं। इसके अलावा गढ़वाल-कुमाऊं अलग नहीं हैं इन्हें एक इकाई के रूप में देखा जाना चाहिए।
सुनील असवाल, पौड़ी : ब्लाक लेवल पर अतिथि टीचर रखे गए थे। इसके बाद उन्हें राजकीय स्तर पर रख लिया गया, जबकि सरकार को पता था कि इस मामले में कोई न कोई कोर्ट में याचिका जरूर डालेगा। ऐसे में इसे क्यों न राजनीतिक स्टंट माना जाए?
- इस बाधा को माननीय न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हुए दूर करेंगे। ब्लाक लेवल पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए भी गेस्ट टीचर रखे जाने की राह निकालेंगे।
हरीश चंद्र, रानीखेत: नई पोस्ट निकाल दी जाती है, जबकि पुरानी पोस्टों पर नियुक्ति तक नहीं होती है। क्या ये चुनावी लॉलीपॉप नहीं है?
- नियुक्ति की प्रक्रिया में समय लगता है। शार्टकट से कई जटिलताएं होती हैं और आगे जाकर यह कोर्ट के हस्तक्षेप का कारण बनती हैं।
मीनाक्षी कुंवर, रामगढ़ : मेरे पति महेश चंद्र सिंह, अर्द्धसैनिक बल(सीआईएसएफ) में हैं और वर्तमान में बारामूला में तैनात हैं। अपने आश्वासन दिया था कि जो सैनिक कश्मीर में तैनात हैं, सरकारी नौकरी में कार्यरत उनकी पत्नियों को बच्चों के नजदीक पोस्टिंग दी जाएगी। पर ऐसा नहीं हुआ। यह सिर्फ मेरी समस्या नहीं है, सीमा पर तैनात कई सैनिकों के परिवारों के साथ यह दिक्कत है। मेरी दो बेटियां हैं, एक 12 तो दूसरी 16 साल की। ऐसे में मैं उनके प्रति चिंतित रहती हूं। क्योंकि स्कूल जाने के लिए सुबह पांच बजे निकलना पड़ता है फिर ढाई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, घर आते-आते शाम के सात बज जाते हैं। वहीं हमारे विभाग में कई टीचर ऐसी हैं जिनकी प्रशासन तक पहुंच है, उन्हें मनचाही पोस्टिंग मिली हुई है। जब मैंने आपसे पति के साथ आकर मुलाकात की थी तो आपने बच्चों के पास पोस्टिंग देने का भरोसा देते हुए प्रार्थना पत्र पर मंत्री प्रसाद नैथानी को देखने के लिए लिखा था पर लगता है उन्होंने आपकी बात को गौर से नहीं लिया या कोई और वजह है?
- सैनिक परिवारों के प्रति हम संवेदनशील हैं। इसके लिए प्रयासरत भी हूं।
अनिरुद्ध, रुड़की: लोकसेवा आयोग में रिफार्म के लिए क्या स्टेप लिए गए, दो से तीन साल बाद रिजल्ट आता है। ऐसे में परीक्षा देने वालों की कई बार ऐज तक निकल जाती है।
- लोक सेवा आयोग को और अधिक प्रभावी बनाने को कहा गया है। संवैधानिक समस्या है।