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दून में उद्योग ‘पी’ रहे भूजल स्रोत
प्रवेश कुमारी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 16 Dec 2014 03:42 PM IST
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भूजल स्रोतों के प्रति चेतने का वक्त आ चुका है। फिलहाल औद्योगिक क्षेत्रों में स्थिति गंभीर है।
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50 सेंटीमीटर तक गिरावट दर्ज
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (सीजीडब्लूबी) के सर्वे की मानें तो दून के सेलाकुई और लालतप्पड़ औद्योगिक क्षेत्र में कई ऐसे पाकेट्स हैं, जहां हर साल भूजल स्तर में 50 सेंटीमीटर तक गिरावट दर्ज की जा रही है।
साफ है, यहां विकास की अंधी दौड़ ने भूजल स्रोतों के लिए मुश्किल पैदा कर दी है। हरिद्वार जिले में रुड़की के भगवानपुर, खानपुर और लक्सर में स्थिति बेहद चिंताजनक है, जबकि उधम सिंह नगर के जसपुर और काशीपुर में भी हालात ऐसे ही हैं। यहां भूजल स्रोतों का 100 फीसदी से भी अधिक दोहन किया जा चुका है।
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बोर्ड के वैज्ञानिक देवाशीष बागची बताते हैं कि गदरपुर, रूद्रपुर, खटीमा में भी स्थिति सुरक्षित नहीं है, लेकिन गंभीर की सीमा तक अभी नहीं पहुंची है। बोर्ड की तरफ से मानसून से पहले और मानसून बाद के सर्वे में कई क्षेत्रों में भूजल सुरक्षित स्तर तक मिला है, जबकि कई स्थानों पर गंभीर हालात भी हैं।
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राहत की बात यह है कि दून शहर भूजल की दृष्टि से अभी सुरक्षित है। यहां के चकराता और कालसी को छोड़कर अन्य 4 ब्लाकों डोईवाला, रायपुर, सहसपुर और विकासनगर में किए गए सर्वे में नतीजा भूजल को सुरक्षित करार देता है। ऐसे ही हालात नैनीताल और रामनगर में भी हैं। यहां भी भूजल को सुरक्षित पाया गया है।
यह हैं मानक
दोहन की सीमा - स्थिति
70 प्रतिशत से कम - सुरक्षित
70-90 प्रतिशत - अधिक गंभीर नहीं
90-100 प्रतिशत - गंभीर
पावर नहीं, प्रावधान लागू कैसे हो...
लगभग 11 साल हो गए, सन् 2003 में प्रावधान किया गया था कि औद्योगिक क्षेत्र में उद्योग लगाने के लिए केंद्रीय भूमिगत जल प्राधिकरण से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) लेना होगा। इस दायरे में प्रतिदिन 20 क्यूबिक मीटर या उससे भी अधिक भूजल दोहन करने वाले उद्योगों को शामिल किया गया था।
अभी इकाई लगाने से पहले कुछ आवेदन जरूर एनओसी के लिए आ रहे हैं, लेकिन ज्यादातर को यह जरूरी नहीं लगती। इनके खिलाफ बोर्ड कुछ भी करने की स्थिति में इसलिए नहीं, क्योंकि प्रावधान होने के बावजूद उसके हाथ में ऐसी इकाईयों के खिलाफ कदम उठाने के लिए वैधानिक पावर नहीं।