गंगा के कायाकल्प के लिए रावत ने केंद्र से मांगा बजट
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उत्तराखंड में गंगा नदी के कायाकल्प के लिए राज्य सरकार ने केंद्र से राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण(एनजीआरबीए) के तहत 9,222 करोड़ रुपए की मांग की है।
साथ ही 25 मेगावाट तक की जलविद्युत परियोजनाओं की स्वीकृति का अधिकार राज्य को दिए जाने का अनुरोध किया है। सोमवार को दिल्ली में केंद्रीय जलसंसाधन नदी विकास तथा गंगा पुनरूद्धार मंत्री उमा भारती की अध्यक्षता में आयोजित एनजीआरबीए की चौथी बैठक में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी मांगें रखी। उन्होंने नदियों को उद्गम में ही दूषित होने से बचाने और उससे जुड़े उपायों को अपनाने की बात कही।
बैठक में सीएम ने राज्य सरकार की कार्ययोजना की विस्तार से जानकारी दी। राज्य में नियमों को लागू करने के लिये प्रवर्तन तंत्र को सुदृढ़ करना होगा।
सीएम ने कहा कि राज्य सरकार नदी के न्यूनतम पारिस्थितिक प्रवाह के विभिन्न पहलुओं के बारे में गंभीर है। विशेषज्ञों के एक समूह को इसके हितधारकों के साथ संवाद स्थापित कर आम सहमति पर पहुंचना होगा।
सफाई पर अधिक ध्यान
उन्होंने कहा कि सामान्य मौसम में नदी का प्रवाह बहुत कम होने से भंडारण के लिए छोटे जलाशय बनाए जा सकते हैं और चरम मौसम में अतिरिक्त वर्षा के जल को इसमें भंडार कर फिर सामान्य मौसम में नीचे बहने वाली आवश्यक धारा प्रवाह को सुनिश्चित किया जा सकता है।
सीएम ने बताया कि राज्य में वनों, पंचायत एवं बंजर भूमि में जल धाराओं के रिचार्ज के लिए एक लाख छोटे जलाशयों को निर्मित एवं पुर्नजीवित किया जाना प्रस्तावित किया है।
सीएम ने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से सफाई पर अधिक ध्यान दिया गया है। यदि पहाड़ में सूखे जलाशयों के कायाकल्प एवं रिचार्ज हेतु एक चौथाई धनराशि भी दी जाती है तो नदियों में शुद्ध प्रवाह बढ़ेगा। जिससे नदी की स्वंय सफाई क्षमता में वृद्धि होगी।
सीएम ने बताया कि गंगा एक्शन प्लान वन और टू के अर्न्तगत अतिरिक्त केंद्रीय सहायता और एनजीआरबीए के लिए जारी धनराशि से ऋषिकेश एवं हरिद्वार में मलउपचार संयंत्र का निर्माण हुआ है। सीवर लाइन एवं सीवेज पंपिग स्टेशन मुनी-की-रेती, गोपेश्वर, देवप्रयाग आदि में स्थापित हैं।
जल विद्युत परियोजनाओं पर भी रोक
मुख्यमंत्री ने कहा कि अधिसूचना में 2 मेगावाट से ऊपर के सभी जल विद्युत परियोजनाओं पर भी रोक लगायी गई है। जबकि कोयला आधारित थर्मल ऊर्जा एवं कार्बन विसर्जन पर्यावरण प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन के मुख्य कारण हैं। राज्य के पास सीमित संसाधन हैं लिहाजा 25 मेगावाट तक की जलविद्युत परियोजनाओं की स्वीकृति का अधिकार राज्य सरकार को दिया जाना चाहिए।
सीएम ने कहा कि नदियों में अत्याधिक गाद होने के कारण बाढ़ एवं आपदा से अधिक क्षति हुई है। इसलिए वैज्ञानिक विधि से खनन की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए। उत्तराखण्ड राज्य गंगा के संरक्षण के लिये एक ज्ञान केंद्र के रूप में भी कार्य कर सकता है एवं प्रदेश में गंगा संग्रहालय भी स्थापित किया जा सकता है।
सीएम ने पेश की कार्ययोजना और खर्च का ब्यौरा
- गंगा नदी एवं सहायक नदियों के किनारे 132 बस्तियां, जहां घरेलू सीवरेज प्रणाली के लिए 7634 करोड़ रुपए की आवश्यकता।
- धार्मिक यात्रा मार्ग एवं मेला आदि क्षेत्रों में 730 स्थल चिंहित हैं जहां सामुदायिक शौचालय निर्माण के लिए 219 करोड़ की धनराशि प्रस्तावित है।
- नदी क्षेत्रों के किनारे 159 ऐसे स्थल चिंहित , जहां पारंपरिक अंतिम संस्कार किए जाते हैं। आधुनिक लकड़ी आधारित या विद्युत श्मशान गृह स्थापित होने पर गंगा नदी में अपशिष्ट निपटान में कमी आएगी। इस पर 52.47 करोड़ रुपए खर्च प्रस्तावित है।
- राज्य में 233 स्थल चिंहित, जहां विकेंद्रीकृत जमीन भराई के साथ ही साथ ठोस अपशिष्ट प्रबंधन किए जाने की आवश्यकता है। इस पर 829 करोड़ 66 लाख रुपए खर्चा आएगा।
- चारधाम क्षेत्रों, मेला क्षेत्रों, यात्रा मार्ग एवं पर्यटक स्थलों पर 1223 स्थान चिंहित किए गए हैं जहाँ 122 करोड़ 30 लाख रुपए की लागत से जैव उपचारित शौचालयों का निर्माण किया जाना है।
- सभी बुनियादी सुविधाओं के संचालन तथा रखरखाव के लिए स्थानीय निकायों को (यूएलबी) को हस्तांतरित करना होगा, इसके लिए कार्मिकों का उचित प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण जरुरी है। इस प्रस्ताव की अनुमानित लागत 6 करोड़ 73 लाख रुपए है।
- आगुन्तक प्रवाह एवं विरासत मानचित्रण अध्ययन का कार्य नदी फ्रंट विकास(आरएफडी) के लिए ऋषिकेश एवं हरिद्वार में चल रहा है। इसके प्रारंभिक कार्य के लिये 300 करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी।
- हरिद्वार एवं काशीपुर के औद्योगिक क्षेत्रों में अपशिष्ट उपचार संयंत्र निर्माण के लिए 25 करोड़ की धनराशि अपेक्षित है।
- श्रमशक्ति बढ़ाने तथा प्रयोगशालाओं के उच्चीकरण के लिए 10 करोड़ रुपए के प्रस्ताव
- ऊपरी गंगा नदी में जलीय जीवन के अध्ययन तथा रक्षा के लिये 3 करोड़ 92 करोड़ लाख रुपए
- धार्मिक क्रियाओं से उत्पन्न बेकार सामग्री के प्रबंधन केलिए एक तंत्र विकसित करने के लिये 4 करोड़ 60 लाख रुपए निवेश की आवश्यकता
- गंगा और सहायक नदियों के किनारे रहने वाले समुदायों की आजीविका गतिविधियों के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने व इसके अध्ययन के लिये 15 करोड़ 29 लाख रुपए की आवश्यकता