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'तिब्बत को कभी आजाद नहीं होने देगा चीन'

Fri, 28 Nov 2014 03:19 PM IST
शूरवीर भंडारी/ अमर उजाला, मसूरी
शूरवीर भंडारी/ अमर उजाला, मसूरी Updated Fri, 28 Nov 2014 03:19 PM IST
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former prime minister of tibet at mussoorie.

निर्वासित तिब्बत सरकार के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री और सांची बोध भारतीय अध्ययन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, शिक्षाविद प्रो. सामदोंग रिंपोछे भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन के पक्षधर हैं।

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उनका कहना है कि यहां की शिक्षा पर पाश्चात्य संस्कृति प्रभावी है। गुरुवार को अमर उजाला से बातचीत में प्रो. सामदोंग रिंपोछे ने शिक्षा, राजनीति, भारत-तिब्बत और भारत-चीन संबंधों पर चर्चा की।
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प्रो. सामदोंग रिंपोछे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभी तक के कार्यकाल को सराहा है। कहा कि मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बेहद करीब होने के बाद भी महात्मा गांधी जी के सिद्धांतों से प्रभावित दिखते हैं।
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जबकि संघ के लोग गांधी जी का नाम लेना भी पसंद नहीं करते हैं। कहा कि कालेधन की वापिस पर पीएम मोदी का जल्दबाजी में दिया गया बयान था।

भारत-चीन संबंध मधुर होना मुश्किल

former prime minister of tibet at mussoorie.

भारत-चीन संबंध पर प्रो. सामदोंग रिंपोछे का कहना है कि भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशी कूटनीतिक मामले में अभी तक सफल रहे हों। लेकिन चीन जैसे देश से अच्छे संबंध स्थापित करना मुमकिन नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारत लोकतांत्रिक देश है जबकि चीन में तानाशाह और साम्यवाद है। इस वजह से दोनों देशों का नेतृत्व चाहे भी तो आपसी संबंध प्रगाढ़ नहीं हो सकते।

प्रयोगात्मक शिक्षा जरूरी
प्रो. सामदोंग रिंपोछे ने कहना है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था मैकाले की शिक्षा पद्धति से नहीं निकल पाई है। यहां अधिकतर लोगों का दिन गुड मॉर्निंग से शुरू होता है और ओके पर खत्म होता है।

कहा कि शिक्षा में सुधार के लिए आजादी के बाद से अब तक कई आयोग गठित किए गए लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है। कहा कि प्रयोगात्मक शिक्षा और महात्मा गांधी द्वारा अंतिम समय में दिए शिक्षा के नेताली सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। कहा कि देश की तरक्की के लिए प्रयोगात्मक शिक्षा बहुत जरूरी है।

नहीं दिखती तिब्बत की आजादी

former prime minister of tibet at mussoorie.

प्रो. सामदोंग रिंपोछे मानते हैं कि तिब्बत की आजादी फिलहाल दूर-दूर तक नजर नहीं आती है। कहा कि चीन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ पूरा विश्व चुप है। कहा कि डेढ़ लाख से अधिक तिब्बती निर्वासित जीवन जी रहे हैं।

इनमें केवल भारत में ही 90 हजार तिब्बती हैं। लेकिन इनके बारे में कोई बोलने वाला नहीं है। कहा कि वियतनाम में एक व्यक्ति के आत्मदाह के बाद उथल-पुथल हो गई थी। लेकिन तिब्बत में चीनी सरकार के दमनचक्र के खिलाफ 133 लोग आत्मदाह कर चुके हैं।

चीन ने तिब्बत की सांस्कृतिक विरासत पर भी हमला किया है। लेकिन तिब्बत की संस्कृति और सभ्यता खत्म नहीं होने वाली। कहा कि तिब्बत सरकार और प्रशासन स्वायत्तता एवं स्वाधीनता के बीच बंटे हैं। कुछ लोग पूर्ण स्वायत्तता की बात करते हैं, जबकि तिब्बत में रह रहे लोग स्वाधीनता पर अडिग हैं।

हालांकि चीनी राष्ट्रपति से उम्मीदें
प्रो. रिंपोछे को विश्वास है कि चीन के राष्ट्रपति तिब्बत की आजादी के बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं, लेकिन चीनी सरकार ऐसा करने नहीं देगी।

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