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विश्व वानिकी दिवस: 25 सालों में उत्तराखंड के इस मिश्रित वन में कभी नहीं लगी आग
Sun, 21 Mar 2021 02:19 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
प्रमोद सेमवाल, अमर उजाला, गोपेश्वर
प्रमोद सेमवाल, अमर उजाला, गोपेश्वर
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Sun, 21 Mar 2021 02:19 PM IST
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उर्गम घाटी के ग्रामीणों का वन संपदा से बेहद लगाव
- फोटो : अमर उजाला
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चमोली जिले के उर्गम घाटी के ग्रामीणों का वन संपदा से बेहद लगाव है। ग्रामीणों की ओर से वर्ष 1996 में तैयार किया गया मिश्रित वन आज घाटी में हरियाली बिखेर रहा है। महिलाएं मिश्रित वन के एक-एक पौधे की देखभाल अपने बच्चों की तरह करतीं हैं। यही वजह है कि इन 25 सालों में कभी भी इस मिश्रित वन में वनाग्नि की घटना नहीं हुई।
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स्वयंसेवी संस्था जनदेश के नेतृत्व में वर्ष 1996 में ग्राम पंचायत पिलखी, भेंटा, अरोसी, देवग्राम और गीरा-बांसा गांव के ग्रामीणों ने क्षेत्र की बंजर भूमि पर मिश्रित वन तैयार किया। वन में संरक्षित प्रजाति के बांज, बुरांश, खड़ीक, देवदार, पय्यां, मणिपुरी बांज, मोरु, पांगर, तिमला आदि पौधे रोपे गए।
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मिश्रित वन खड़ा करने में क्षेत्र की महिला मंगल दल की महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। महिलाएं श्रमदान कर पेड़-पौधों के लिए पानी और गोबर की व्यवस्था करतीं हैं, जबकि युवक मंगल दल के युवा हर वर्ष पौधरोपण करते हैं। महिलाएं मवेशियों के लिए इसी वन से चारापत्ती की व्यवस्था करतीं हैं।
जनदेश के सचिव लक्ष्मण सिंह नेगी बताते हैं कि मिश्रित वन में सैकड़ों पेड़ लहलहा रहे हैं। इससे पर्यावरण की शुद्धता के साथ ही पेयजल स्रोत रिचार्ज हो रहे हैं। उर्गम घाटी खूबसूरत पर्यटन स्थल भी है। यहां वर्षभर पर्यटकों की आवाजाही बनी रहती है। ग्रामीण पर्यटकों से उनके नाम से एक-एक पौधा रोपने का आह्वान करते हैं।
गौरा देवी के नाम पर तैयार किया वन
उर्गम घाटी में ही भेंटा गांव के ग्रामीणों ने चिपको नेत्री गौरा देवी के नाम से वन तैयार किया है। मनरेगा के सहयोग से ग्रामीणों ने वर्ष 2015-16 में वन तैयार किया था। इस वन में लगभग 1000 पौधे हैं, जो मिश्रित प्रजाति के हैं। प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को इस मिश्रित वन में बाल पंचायतें आयोजित की जाती हैं, जिसमें बच्चों को पर्यावरण संरक्षण और पौधरोपण की महत्ता के बारे में बताया जाता है।