{"_id":"5cc14ec1ee86744cf3b658457ae8b6bf","slug":"flats-in-dehradun-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्टः कहां गए गरीबों के फ्लैट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्टः कहां गए गरीबों के फ्लैट
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 07 Sep 2014 12:11 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देहरादून में ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट तेजी से पैर पसार रहे हैं, लेकिन चारों ओर उग रही इन ऊंची इमारतों में गरीबों के आशियाने के लिए कोई जगह नहीं।
विज्ञापन
इकोनॉमिक वीकर सेक्शन जरूरी
तब भी नहीं, जब एमडीडीए की भवन निर्माण नियमावली में यह स्पष्ट उल्लेख है कि कोई प्रोजेक्ट तभी पास किया जाएगा जबकि बिल्डर कुल फ्लैट के दस फीसदी इकोनॉमिक वीकर सेक्शन (ईडब्लूएस) के लिए तैयार करेगा।
विज्ञापन
लेकिन न तो बिल्डर इस नियम का पालन कर रहे हैं, न ही एमडीडीए को जमीनी हकीकत की जांच करने की कोई सुध है। आलम यह है कि वर्ष 2011 में यह नियम लागू होने के बाद से अब तक एमडीडीए 600 ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट के नक्शे पास कर चुका है।
विज्ञापन
अब अगर मान लिया जाए कि हर प्रोजेक्ट में औसत 100 फ्लैट हैं तो कुल संख्या 60 हजार होती है। इसका दस फीसदी यानी 6000 फ्लैट गरीबों के लिए होने चाहिए। लेकिन ये फ्लैट हैं कहां, इसका जवाब न बिल्डरों के पास है न ही एमडीडीए के।
प्राधिकरण खुद लापरवाह
नियमानुसार होना यह चाहिए था कि प्राधिकरण खुद हर प्रोजेक्ट की लगातार निगरानी करता और यह सुनिश्चित किया जाता कि ईडब्लूएस फ्लैट बनाए जा रहे हैं या नहीं।
एमडीडीए अपनी इस जिम्मेदारी पर कितना सचेत है, इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि अब तक एक भी बिल्डर को ईडब्लूएस न बनाने पर नोटिस तक जारी नहीं किया गया है। कार्रवाई तो दूर की बात है।
कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं लेता कोई
यूं तो कोई भी प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद एमडीडीए से कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने की व्यवस्था दी गई है, लेकिन शायद ही कोई बिल्डर यह सर्टिफिकेट लेने एमडीडीए जाता हो।
प्राधिकरण के स्तर पर भी ऐसा कोई दबाव बनाने की कोशिश नहीं की जाती। ऐसे में बिल्डर बेपरवाह रहते हैं, जबकि एमडीडीए बेसुध। इसके चलते कई बार बाद में मालूम होता है कि प्रोजेक्ट में निर्माण कार्य नक्शे से इतर कर दिया गया है।
बिल्डरों का ऐतराज
हाल ही में संशोधित भवन निर्माण नियमावली पर आयोजित बैठक में बिल्डरों ने ईडब्लूएस नियम पर ऐतराज जताया था। खुद प्राधिकरण भी अब तक एक भी ईडब्लूएस मकान नहीं बना सका है।
बिल्डरों का कहना है कि यह स्पष्ट नहीं है कि ईडब्लूएस की मेंटेनेंस की व्यवस्था क्या होगी। सरकार की ओर से ईडब्लूएस फ्लैट की रकम बिल्डर को चुकाने की बात पर भी उनका कहना है कि यह रेट तय नहीं है। इसके अलावा अलग-अलग क्षेत्रों में रेट भी अलग होंगे या नहीं, यह भी साफ नहीं है।
बिल्डरों का सुझाव
सबसे पहले सरकार ईडब्लूएस का रेट तय करे। बिल्डर से यूनिट बनवाने के बजाए पैसा ले ले। इसके बाद कहीं सरकारी जमीन पर मकान बनवा कर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को बेच दे।
सचिव ने मांगा है प्रस्ताव
ईडब्लूएस मकानों के संबंध में सचिव आवास डीएस गर्ब्याल ने एमडीडीए सचिव बंशीधर तिवारी को प्रस्ताव तैयार करने के लिए कहा है। तिवारी बताते हैं कि फार्मूला तैयार है, जल्द ही इसे आवास मंत्री के समक्ष पेश किया जाएगा। इसके बाद ईडब्लूएस न बनाने वाले बिल्डरों को नोटिस दिया जाएगा।