देश में पहली बार होगा बचपन की चोट का अध्ययन
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देश में पहली बार चाइल्डहुड इंजरी (बचपन की चोट) की डिटेल स्टडी होगी। देश के 10 चिकित्सा शिक्षा संस्थानों को इसकी जिम्मेदारी दी गई है।
इनमें वीर चंद्र सिंह गढ़वाली राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर भी शामिल है। सैंपल के तौर पर शोध में सम्मिलित शोधकर्ता (डॉक्टर) क्षेत्र विशेष में बचपन की चोट के आंकड़ों को जुटाने के साथ ही विश्लेषणात्मक अध्ययन करेंगे। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की ओर से कराया जाने वाला यह अध्ययन दो साल चलेगा।
चाइल्डहुड इंजरी स्वास्थ्य क्षेत्र की बहुत बड़ी समस्या है। डब्लूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के अनुसार चाइल्डहुड इंजरी भी बच्चों की मौत की एक प्रमुख वजह है। बचपन की चोट से जो लोग प्रभावित हैं, उनको समुचित इलाज की जरूरत होती है, लेकिन चाइल्डहुड इंजरी किसी तरह के आंकड़े संकलित नहीं है। जिसके चलते बचपन की चोट के उपचार हेतु प्रभावी शोध नहीं हो पा रहा है।
इसी समस्या पर फोकस करते हुए आईसीएमआर डिटेल स्टडी (विस्तृत अध्ययन) करवा रही है। इसमें भारत के 7 राज्यों के 10 स्थान चिन्हित किए गए हैं। 10 मेडिकल कॉलेज के शोधकर्ता इस काम को करेंगे। शोधकर्ता शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में चोट का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। इसमें 0-18 साल तक के बच्चों-युवाओं को शामिल किया जाएगा। जब अलग-अलग क्षेत्रों से शोध रिपोर्ट मिल जाएगी तो इस समस्या से निपटने के लिए कारगार नीति बनाई जा सकेगी।
ये संस्थान है प्रोजक्ट में सम्मिलित संस्थान
संस्थान:
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर
एमएस रमैया मेडिकल कॉलेज बंगलूरू
सीएमसी वैल्लूर
वेल्ललार कॉलेज फार वुमैन थैंडल
कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज मणिपाल विवि
बरदवान मेडिकल कॉलेज पश्चिमी बंगाल
पीडीयू मेडिकल कॉलेज राजकोट
एसआरएम यूनिवर्सिटी सिक्किम
जीएस मेडिकल कॉलेज अहमदाबाद
डीएमएंडएच लुधियाना
प्रो. अमित का प्रपोजल हुआ पास
चाइल्डहुड इंजरी रिसर्च प्रोजक्ट राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर को मिलना बड़ी उपलब्धि है। कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रो. अमित सिंह इस शोध को करेंगे। उन्हें 2 साल तक 3500 बच्चों पर यह अध्ययन करना होगा। पौड़ी जिले का खिर्सू ब्लॉक उनके शोध का क्षेत्र है। आईसीएमआर ने देश भर के डॉक्टरों से इस स्टडी के लिए प्रपोजल मांगे थे, जिसमें से 10 चयनित हुए। इसमें प्रो. अमित भी शामिल हैं।
स्टडी के फायदे
0-18 साल तक के बच्चों-युवाओं की बचपन की चोट के आंकड़े उपलब्ध हो सकेंगे।
क्षेत्र विशेष में बच्चों की चोट की घटनाओं का अध्ययन होगा।
चोट से होने वाले नुकसान, बचाव और भविष्य में सुधार पर काम हो सकेगा।