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उत्तराखंड के 5 लाख हेक्टेयर जंगल में बिछी है ‘बारूद’ की परत
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 04 Feb 2016 12:42 PM IST
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उत्तराखंड के देवदार, बांज और साल के जंगल चीड़ की आग के खतरे में हैं। चीड़ की ज्वलनशील पत्तियां पिरुल की परतें पांच लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र में पटी पड़ी हैं।
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इन पत्तियों से निकलने वाला रसायन लीसा बारूद की तरह ज्वलनशील होता है, अगर इसने आग पकड़ ली तो तबाही मच जाएगी। पिरुल की दिक्कत दूर करने की वन विभाग की हर रणनीति फ्लाप रही है। जंगलों का तापमान बढ़ने से वन विभाग की नींद उड़ी है। चीड़ अपने क्षेत्र के अलावा नीचे साल और ऊपर देवदार और बांज के जंगलों में भी घुस गया है।
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भारतीय वन अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट है कि प्रदेश के जंगलों में हर साल चीड़ की 60 लाख टन पिरुल निकलती है। इतनी पिरुल उठ नहीं पाती, जिससे इसकी मात्रा बढ़ती जा रही है। पिरुल सालों नहीं सड़ती है। इससे ये अपने नीचे कोई वनस्पति भी पनपने नहीं देती है। वन विभाग का अनुमान है इस वक्त एक करोड़ टन से अधिक पिरुल जंगलों में मौजूद है।
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आग के खतरे में आ गए जंगल
वनों का तापमान बढ़ने से इनमें कभी भी आग लग सकती है। साथ ही पांच सालों में चीड़ देवदार, बांज और साल के जंगलों में भी घुस गया है। ये जंगल भी आग के खतरे में आ गए हैं। वन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पिरुल ने आग पकड़ ली तो इस पर काबू पाना असंभव हो जाता है।
वन मंत्री दिनेश अग्रवाल ने पिरुल के खतरे के मद्देनजर जंगलों से मुफ्त पिरुल ले जाने की अनुमति दे दी थी। फिर भी प्रदेश के जंगल पिरुल से पटे पड़े हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीड़ ‘आक्रांता’ की तरह साल, देवदार और बांज के जंगल में घुस रहा है। जंगलों में आग के खतरे के मद्देनजर प्रमुख वन संरक्षक गढ़वाल गंभीर सिंह का कहना है कि विभागीय अधिकारियों को चौकन्ना कर दिया गया है। इसके साथ ही वनवासियों को आग से बचाव के संबंध में प्रशिक्षित किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट को नहीं भेज पाए प्रस्ताव
वन विभाग ने चीड़ के पेड़ों की कटान के लिए सुप्रीम कोर्ट से अनुमति का प्रस्ताव तैयार किया था, लेकिन इसे अभी तक भेजा नहीं जा सका। बाद में वन मंत्री ने कहा था कि प्रस्ताव को कैबिनेट में पास कराने के बाद सीधे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। अभी तक इस संबंध में कोई प्रगति नहीं हुई है।