सैनिकाें की जंग: सरकारी तंत्र में उलझकर दम तोड़ रहे पूर्व सैनिकों की सुविधाओं से जुड़े मसले
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सरहद पर अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने के बाद आम नागरिक की भूमिका में आए प्रदेश के हजारों पूर्व सैनिकों की सुविधाओं से जुड़े मसले सरकारी तंत्र में उलझकर दम तोड़ रहे हैं। ‘अमर उजाला’ ने इन मसलों की गहराई में जाकर, उन्हें जिम्मेदारों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। यदि आपके पास भी पूर्व सैनिकाें की दिक्कत से जुड़ी कोई भी जानकारी है तो उसे साझा कर सकते हैं।
घोषणा के बाद भी शहीद के परिजनों को नहीं मिली भूमि
कारगिल युद्ध में अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीद जवान के परिवार को 20 साल बाद भी भूमि नहीं मिल सकी है। तत्कालीन यूपी सरकार ने भूमि देने का एलान किया था। परिजनों का आरोप है कि इस संबंध में कई बार मुख्यमंत्री और क्षेत्रीय विधायक से मुलाकात करके आग्रह भी किया, लेकिन सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले जवान रमेश थापा के छोटे भाई शंकर थापा ने बताया कि 1999 में भाई रमेश शहीद हो गए थे। इसके बाद तत्कालीन यूपी सरकार(उत्तराखंड राज्य बनने से पहले) ने भूमि देने की घोषणा की थी, लेकिन 20 साल बाद भी जमीन नहीं मिल पाई है। शंकर थापा ने बताया कि बचपन से ही हम दोनों भाइयों को देश की रक्षा करने के लिए सेना में जाने का सपना था। दोनों भाई एक साथ ही सेना में भी भर्ती हुए थे। हम दोनों भाईयों के बीच अक्सर घर बनाने के बारे में बात हुआ करती थी। दोनों ने एक दूसरे को वादा किया था कि घर बनाने के बाद शादी भी एक साथ ही करेंगे। बड़े भाई के शहीद होने के बाद सपने बिखर गए थे। भाई के शहीद होने के बाद जब सरकार ने जमीन नहीं उपलब्ध कराई तो पहले घर के सपने को साकार किया।
पाक के लिए मन में है आग
5/3 गोरखा राइफल बटालियन में बतौर जवान तैनात शंकर ने बताया कि वह द्रास कारगिल में तैनात है। पुलवामा में आतंकी हमले के बारे में सोच-सोच कर पाकिस्तान के खिलाफ आग निकल रही है। सरकार की ओर से आदेश मिले तो पाक को कुछ घंटों में ही साफ कर दिया जाएगा।
पेंशन निर्धारण में होता है उत्पीड़न
फेसबुक पर अपील करने वाले मेजर नवदीप सिंह (सेवानिवृत्त) सेना में ड्यूटी करने वालों और पूर्व सैनिकाें दोनों के ही हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं। सेवानिवृत्त होने के बाद पूर्व सैनिकाें को सबसे ज्यादा पेंशन निर्धारण में होती है। ऑडिट डिपार्टमेंट द्वारा औपचारिकता पूरी करने के नाम पर किया जाना उत्पीड़न किसी से छिपा नहीं है। काफी पूर्व सैनिक ऐसे हैं, जिन्हें मानक के अनुरूप पेंशन नहीं मिल पा रही है। कैंटीन कोटे में सरकार ने छेड़छाड़ कर पूर्व सैनिकों को निराश किया है। काफी भत्ते खत्म करने के साथ कई भत्ताें में कटौती की गई है।- कर्नल नरेंद्र रावत (सेवानिवृत्त)
शहीदों की पत्नी को मिले शौर्य पेंशन
देश पर अपनी जान न्योछावर करने वाले जवानों के दिवंगत होने के बाद उनके परिवार पर आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है। ऐसे में शहीदों की पत्नी के लिए राष्ट्रीय शौर्य पेंशन अथवा राष्ट्रीय उत्कृष्ट सेवा पेंशन का प्रावधान किया जाए। साथ ही उनके बच्चाें को संपूर्ण शिक्षा निजी और सरकारी संस्थानाें में निशुल्क दी जाए।-बाला दत्त शर्मा
उत्तराखंड में पंजीकृत पूर्व सैनिक और एवं विधवाएं
पूर्व सैनिक 1,26,540
विधवाएं (1,463 युद्ध विधवाओं सहित)- 42,979
प्रत्येक वर्ष सेवानिवृत्त होने वाले सैनिक-- करीब तीन हजार
(सरकारी आंकड़ों के मुताबिक)
पूर्व सैनिकाें को कई घोषणाओं की उम्मीद
देशभर के पूर्व सैनिक और उनके परिवार वन रेंक-वन पेंशन, पेंशन खामियों, मेडिकल और कैंटीन कोटा घटाने संबंधित अनेक समस्याओं से जूझ रहे हैं। ईसीएसएस योजना के तहत पूर्व सैनिकों को न तो मेडिकल परीक्षण और न ही दवाओं की सुविधाएं मिल पा रही हैं। उन्हें बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। पुलवामा हमले के बाद देश में पैदा हालात के मद्देनजर पूर्व सैनिकों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 25 फरवरी में दिल्ली में होने शहीद मेमोरियल के उद्घाटन के दौरान कई बड़ी घोषणाएं किए जाने की उम्मीद है। इस कार्यक्रम को लेकर पूर्व सैनिकों में खासा उत्साह है। इसमें पेंशन संबंधी दिक्कतों का निराकरण होने के साथ कई सुविधाएं बढ़ने की घोषणाएं हो सकती हैं।
- बिग्रेडियर आरएस रावत (सेवानिवृत्त)
शहीदों की याद में बने स्मारक और चौराहे बदहाल
शहर के तीन जांबाजों मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल, मेजर चित्रेश बिष्ट और एएसआई मोहनलाल रतूड़ी की शहादत के बाद नगर निगम ने शहर के कई चौराहों के नाम उनके नाम पर रखने की घोषणा की है। हम इस घोषणा का सम्मान करते हैं लेकिन शहर में तमाम ऐसे चौराहे और स्मारक हैं, जिनके नाम शहीदों के नाम पर रखे गए थे, आज उनके हाल बदहाल हैं। अमर उजाला टीम ने इनकी पड़ताल की तो स्थिति बेहद चिंताजनक सामने आई। हालत यह थी कि कहीं शहीद के नाम के लगे बोर्ड पर पोस्टर चस्पा दिए गए हैं तो कहीं शहीद द्वार पर तारों का मकड़जाल है। ऐसे में सवाल उठ रहा है इन शहीद द्वार अथवा स्मारकों की बेकद्री क्यों?
शहीद हमीद की मूर्ति पर चिपके पोस्टर
कचहरी चौक का नाम वीर अब्दुल हमीद रखा गया था। यहां पर लगाए गए बोर्ड पर पोस्टर चिपके हुए हैं। इससे यहां से गुजरने वालों की नजर शहीद के नाम पर नहीं पड़ती। कई बार शिकायत के बाद भी नगर निगम प्रशासन इस तरफ ध्यान नहीं दे रहा है। यदि निगम प्रशासन चाहे तो वर्ष 1965 में भारत-पाक युद्ध के अमर शहीद वीर अब्दुल हमीद के स्मारक को सजाकर उसे दर्शनीय बना सकता है। यहीं पुलिस यातायात की छोटी चौकी भी है। बावजूद, इस चौराहे के आसपास कचरा हमेशा पड़ा रहता है।
शहीद द्वार पर बिजली के तारों का मकड़जाल
जम्मू-कश्मीर में शहीद हुए 41 गोरखा रायफल बटालियन के जवान शहीद जीत बहादुर थापा के नाम पर बंजारावाला में अमर शहीद जीत बहादुर थापा द्वार बनाया गया है। लेकिन, इस द्वार पर तारों का गुच्छा लटका हुआ है। खंभा भी जर्जर हो गया है। जिसकी वजह से द्वार के गिरने की आशंका बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है, इसकी कई बार शिकायत भी नगर निगम और ऊर्जा विभाग के अधिकारियों से भी की, लेकिन अभी तक द्वार की हालत जस की तस है।
गुलाटी चौक पर शहीद की मूर्ति पर पुरानी माला
विकास भवन के सामने बने शहीद जतिन गुलाटी चौक पर जतिन गुलाटी की प्रतिमा पर कई दिनों से पुरानी फूलों की माला पड़ी हुई है। पूछने पर पता चला कि करीब 11 दिन पहले यहां कोई कार्यक्रम था, तभी यह माला शहीद की प्रतिमा पर चढ़ाई गई थी। आसपास के लोगों ने बताया इस चौक की साफ-सफाई करने कभी-कभार निगम के कर्मचारी पहुंच जाते हैं। इस चौक को सुंदर बनाने के लिए सरकार या प्रशासन की ओर से प्रयास किए जाने चाहिए, लेकिन कुछ होता नजर नहीं आ रहा है।
चूना लगा होने के चलते नहीं दिखता शिलापट
दिलाराम बाजार चौक से राजभवन की ओर जाने वाले मार्ग का नाम कारगिल में शहीद हुए लेख गुरुंग के नाम पर रखा गया है। लेकिन, मार्ग पर लगे शिलापट पर चूना लगा होने की वजह से यह नाम लोगों को दिखाई ही नहीं देता। ऐसे में अधिकतर लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि इस मार्ग के नाम क्या है।
यदि ऐसी स्थिति है तो चिंताजनक है। कर्मचारियों को भेजकर साफ-सफाई कराई जाएगी। शहीदों का हम सभी को सम्मान करना चाहिए। ऐसे में यह जिम्मेदारी सभी कि है खुद भी वहां साफ-सफाई रखें। यदि प्रतिमा पर माला पहना रहे हैं तो उसे अगले दिन हटानी भी चाहिए।
-सुनील उनियाल गामा, मेयर
पार्षदों ने की शहीदों के नाम पर चौक-द्वार बनाने की मांग
पार्षदों ने बुधवार को मेयर से शहीदों के नाम पर चौक और द्वार बनाने की मांग की। कहा कि शहीदों के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता। ऐसे में उनकी याद हमेशा जेहन में ताजा रहे, इसके लिए चौक और द्वार बनाए जाएं। पार्षद अमिता सिंह, डॉ. विजेंद्र पाल, मीनाक्षी आदि ने मेयर को प्रस्ताव दिया। जिसमें उन्होंने नेहरू कॉलोनी का नाम शहीद चित्रेश बिष्ट, नेशविला रोड पर स्थित चौराहे का नाम शहीद मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल और गांधीग्राम वार्ड का नाम शहीद मोहनलाल रतूड़ी के नाम पर रखा जाए। इस पर मेयर ने कहा कि अब तक छह प्रस्ताव आ चुके हैं। 28 फरवरी को होने वाली बोर्ड बैठक में इन प्रस्तावों पर मुहर लगने के बाद नाम परिवर्तित किए जाएंगे।
शहीदों के नाम पर रखे जाएं फ्लाईओवर के नाम: उक्रांद
उक्रांद ने राजधानी के फ्लाईओवर के नाम शहीदों के नाम पर रखने की बात कही है। पार्टी प्रवक्ता सुनील ध्यानी की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा कि पूरा देश सैनिकों की शहादत से गमगीन है। ऐसे में पुलवामा आतंकी हमले में शहीद सैनिकों के नाम पर फ्लाईओवर के नाम रखे जाएं।