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प्रसिद्ध दक्षिण कालीपीठ में 800 साल पुरानी पशुबलि प्रथा बंद

Wed, 21 Oct 2015 02:34 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार
ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार Updated Wed, 21 Oct 2015 02:34 AM IST
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end of animal sacrifice at Dakshina kalipeeth in haridwar.

हरिद्वार की प्रसिद्ध दक्षिण कालीपीठ पर पशुबलि समाप्त कर दी गई है। इस तंत्र पीठ पर करीब 800 वर्षों से पशुबलि हो रही थी। मंगलवार को दक्षिण कालीपीठाधीश्वर महामंडलेश्वर कैलाशानंद ब्रह्मचारी ने स्वयं यह घोषणा की। बीते कई सालों से कई संगठन इसका विरोध भी करते आ रहे थे।

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उत्तर भारत में दक्षिण कालीपीठ का लंबा इतिहास रहा है। विश्वविख्यात तंत्र सम्राट बाबा कामराज की यह कर्मभूमि रही है। मान्यता है कि बाबा कामराज आज भी मंदिर क्षेत्र में विद्यमान है। जबकि बाबा इस क्षेत्र में 800 वर्ष पूर्व रहा करते थे।
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उत्तर भारत की यह एक मात्र ऐसी सिद्धपीठ है जहां दो प्रकट और दो गुप्त (चारों) नवरात्रों में तंत्र साधना की जाती है। यूं तो वर्षभर इस पीठ पर मांगलिक एवं तांत्रिक अनुष्ठान चलते रहते हैं।

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पशुबलि परंपरा का हरिद्वार का एकमात्र मंदिर

end of animal sacrifice at Dakshina kalipeeth in haridwar.

हरिद्वार का यह एक मात्र मंदिर है जहां पशुबलि की परंपरा रही है। कई वर्षों से विभिन्न संगठन इसका विरोध करते आ रहे हैं। उत्तराखंड के शेष मंदिरों में बलि प्रथा समाप्त हो चुकी है। मंगलवार को दक्षिण कालीपीठ में भी बलि प्रथा समाप्त करने की घोषणा की गई। इस घोषणा का धर्म क्षेत्र में स्वागत किया गया।

बोले पीठाधीश्वर
बलि प्रथा समाप्त करने का निर्णय विगत वर्ष ले लिया था। जनभावनाओं एवं मान्यताओं के चलते परंपरा का निर्वहन किया जा रहा था। हम लोग अग्नि के उपासक हैं और वैष्णव मूल्यों का सम्मान करते हैं। दक्षिण कालीपीठ पर अब बलि प्रथा नहीं होगी। अन्य मंदिर की भांति यहां नवरात्र की पूजा की जाएगी।
-कैलाशानंद ब्रह्मचारी, दक्षिण कालीपीठाधीश्वर

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