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उत्तराखंड में सैकड़ों साल बाद 'कुंभकरणीय नींद' से जाग रही हैं ये, वैज्ञानिकों का बढ़ा स्ट्रेस
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 09 Dec 2017 07:07 AM IST
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सैकड़ों साल बाद इसके 'कुंभकरणीय नींद' से जागने के कारण वैज्ञानिकों का स्ट्रेस बढ़ गया है। यह मुश्किल न सिर्फ वैज्ञानिकों के लिए बल्कि आम जीवन को भी प्रभावित करेंगी।
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हिमालय में स्ट्रेस बढ़ने से भूकंपीय पट्टियां कुंभकरणीय नींद से जाग रही हैं। कहीं इन पट्टियों को कुछ साल हुए हैं तो कहीं भूकंप पट्टी पांच-छह सौ साल बाद जागी है। भूंकप विज्ञानियों की इससे चिंता बढ़ गई है।
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मध्य हिमालय क्षेत्र उत्तराखंड की देहरादून और गैरसैंण दोनों राजधानियों की संवेदनशीलता बढ़ती जा रही है। हिमालयी क्षेत्र में साढ़े चार हजार भूकंप पट्टियां चिन्हित हैं और देहरादून में अभी तक 22 पट्टियों को चिन्हित किया है।
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भूकंप के मामले में उच्च हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता हर रोज बढ़ रही है। जैसे-जैसे इंडियन प्लेट का मूवमेंट यूरेशियन प्लेट के नीचे बढ़ता हैभूकंपीय संवेदनशीलता में इजाफा हो जाता है। 23 सितंबर को कश्मीर के संबल क्षेत्र में आए भूकंप ने सबको चौंका दिया है।
वर्ष 2005 में आठ अक्तूबर को यहीं पास में 7.5 मैग्नीट्यूड का भूकंप आ चुका है। यह भूकंप क्षेत्र 562 साल से सोया हुआ था। ग्रेट भूकंप हर 500साल में रिपीट होता है। इसी तरह हिंदूकुश इलाके में भूकंप पट्टियों की सक्रियता बढ़ी है।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून जोन चार में है, लेकिन घाटी होने के कारण यहां संवेदनशीलता अधिक हो गई है। मिट्टी और पानी होने से यहांनुकसान अधिक हो सकता है। इस संबंध में नेशनल सेंटर फॉर सीइसमोलोजी के निदेशक डॉ. विनीत के. गहलोत ने इस पर शोध किया है। इसी तरह जोन पांच आने पर गैरसैंण अधिक संवेदनशील हो गया है।
विज्ञानी इसका आकलन कर रहे हैं। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. एके गुप्ता की अगुवाई में हुए शोध में दून में 22 भूकंपपट्टियां चिन्हित की गईं। हिमालयी क्षेत्र में इनकी संख्या साढ़े चार हजार से अधिक है। हिमालय में बढ़े रहे स्ट्रेस से ये खतरे का निशान बन गई हैं।
भूकंप के पहले आते हैं ये बदलाव, रखें ध्यान
(सेंट्रल यूनिवर्सिटी हैदराबाद के भाभा चेयर प्रोफेसर बीपी डिमरी ने बताईं ये निशानियां)
-भूकंप आने के हफ्ता भर पहले से तापमान में अचानक बदलाव आता है, तापमान दो से चार डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है।
-भूगर्भ से हीलियम गैस का रिसाव होने लगता है।
-जलस्रोतों, तालाब, कुओं में पानी घट जाएगा या बहुत बढ़ जाएगा।
-अचानक नदियों और नालों में पानी बढ़ने लगे या घट जाए।
-पशु-पक्षियों में बेचैन नजर आने लगें।
-पानी के रंग में बदलाव आए या स्वाद में बदलाव आए।
ये हैं साक्ष्य
-भुज, नेपाल में भूकंप के दौरान तापमान तीन से चार डिग्री सेल्सियस बढ़ा था।
-उत्तरकाशी भूकंप के 10 दिन पहले झरनों के पानी से कपड़े साफ होना बंद हो गए।
-लातूर भूकंप के हफ्ता भर पहले नील कंठेश्वर कुंड का पानी गायब हो गया था।
-भूकंप आने के हफ्ता भर पहले से तापमान में अचानक बदलाव आता है, तापमान दो से चार डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है।
-भूगर्भ से हीलियम गैस का रिसाव होने लगता है।
-जलस्रोतों, तालाब, कुओं में पानी घट जाएगा या बहुत बढ़ जाएगा।
-अचानक नदियों और नालों में पानी बढ़ने लगे या घट जाए।
-पशु-पक्षियों में बेचैन नजर आने लगें।
-पानी के रंग में बदलाव आए या स्वाद में बदलाव आए।
ये हैं साक्ष्य
-भुज, नेपाल में भूकंप के दौरान तापमान तीन से चार डिग्री सेल्सियस बढ़ा था।
-उत्तरकाशी भूकंप के 10 दिन पहले झरनों के पानी से कपड़े साफ होना बंद हो गए।
-लातूर भूकंप के हफ्ता भर पहले नील कंठेश्वर कुंड का पानी गायब हो गया था।