पहाड़ की पीड़ा ने मैदानी इलाके के डॉक्टर को बनाया ‘पहाड़ी’
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पहाड़ों की खूबसूरत वादियां हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की कमी के चलते यह खूबसूरती सूनी होती जा रही है।
सुदूरवर्ती क्षेत्रों में तो पलायन का दंश इतना गहरा है कि कई गांव पूरी तरह से वीरान हो गए हैं। इसकी वजह गांवों में शिक्षा और रोजगार की समस्या के साथ ही छोटे-मोटे उपचार के लिए मीलों की दौड़ है। पहाड़ की ये पीड़ा देखकर लखनऊ से यहां की खूबसूरत वादियों के दीदार को आए डॉ. राजीव गर्ग यहीं के होकर रह गए।
डॉ. गर्ग लोगों का निशुल्क इलाज करने के साथ ही उनके हर सुख-दुख में शरीक होते हैं। पहाड़ से पलायन करने वालों को उनका संदेश अर्न, लर्न बट रिर्टन का है।
लखनऊ के रहने वाले डॉक्टर राजीव गर्ग ने कानपुर मेडिकल कालेज से एमएस की डिग्री ली और लखनऊ में चौक पर अपना अस्पताल खोला।
करीब 20 साल अस्पताल चलाने के बाद करीब तीन साल पहले वह चमोली आ गए। यहां आने के बाद वो यहीं के होकर रह गए और उन्होंने जोशीमठ ब्लाक के बडागांव से लोगों का निशुल्क इलाज शुरू कर दिया जो आज भी जारी है।
डॉक्टर कम गांव वाला कहलाना ज्यादा पसंद
डॉ. राजीव बताते हैं कि वे करीब 12 साल पहले पहाड़ घूमने आए थे। इस दौरान उन्होंने देखा कि लोग मामूली बीमारी के इलाज के लिए भी शहर की दौड़ लगाने को मजबूर हैं। उन्होंने बताया कि इसके बाद वे हर साल पहाड़ आते थे और लोगों का अपने संसाधनों से फ्री में छोटी-मोटी सर्जरी करते थे।
बताते हैं कि पहाड़ के लोगों की पीड़ा को देखते हुए उन्होंने फिर अपनी एक बिटिया की शादी करके अपना अस्पताल भांजे को सौंपकर पहाड़ में बसने का फैसला किया और फिर तीन साल पहले जोशीमठ के बडागांव में पत्नी के साथ आ गए।
डॉ. गर्ग बताते हैं कि अब तो वे गांव वालों के साथ वे इतना घुलमिल गए हैं कि वे अपने को डॉक्टर कम गांव वाला कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। अब तो गांव वाले भी उन्हें गांव का ही हिस्सा मनाने लगे हैं। इस बार तो उन्होंने रामलीला में सुषेन वैद्य की भूमिका भी निभाई।
डॉ. गर्ग बताते हैं कि वे वर्तमान में सीएचसी जोशीमठ में संविदा पर कार्यरत हैं, जो भी यहां से मिलता है उसी से लोगों के लिए दवाइयां खरीदकर उन्हें देता हूं। डॉ. गर्ग लखनऊ रोटरी क्लब के अध्यक्ष और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सचिव भी रह चुके हैं। डा. गर्ग के सामाजिक सरोकारों का एक उजला पक्ष और भी है।
उन्होंने बडागांव की एक मानसिक रूप से बीमार महिला की दो बालिकाओं को पढ़ाने का जिम्मा लिया। उन्होंने पढ़ाने के लिए एक बालिका को अपने भांजे के पास लखनऊ, तो दूसरी को अपनी बेटी के पास पढ़ाने के लिए भेज दिया। उनका सपना है कि बालिकाएं पढ़कर पहाड़ के सेवा के लिए लौट आए।