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पुजारी की आंखों देखी, केदारनाथ में वो रात

Mon, 16 Jun 2014 09:25 PM IST
नरेश कुकरेती/वेदपाठी, केदारनाथ मंदिर
नरेश कुकरेती/वेदपाठी, केदारनाथ मंदिर Updated Mon, 16 Jun 2014 09:25 PM IST
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disaster story by kedarnth priest

रविवार 16 जून को मैं केदारनाथ मंदिर में ही था। शाम से पानी बरसना शुरू हो गया था। रात आठ बजे मंदाकिनी का पानी तेजी से बढ़ा तो लोगों ने मंदिर की ओर भागना शुरू किया। मेरा अनुमान है कि सभामंडप में उस रात एक हजार से ज्यादा लोग जमा गए थे।

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पानी के वेग और बादलों की गरज कानों तक पहुंच रही थी। बीच में शिव की भी स्तुति गूंजी। कोई दीवार पर बने आलों में बैठा था तो किसी ने देव प्रतिमाओं का सहारा ले रखा था।
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सुबह करीब साढ़े छह बजे तक पानी का वेग कुछ कम हुआ। उस वक्त हर चेहरे पर रात के सही सलामत गुजरने का सुकून था।

ताश के पत्तों की तरह उड़ गए मकान

disaster story by kedarnth priest

सोमवार की सुबह ठीक सवा सात बजे शिव का रौद्र रूप सामने आया। मंदाकिनी के स्रोत पर धमाके के साथ करीब ढाई सौ मीटर ऊंचा काला बादल उठा। धूल, गर्द और धुआं भरे इस बादल का आकार शिव की जटाओं जैसा था। तेज हवा ने कई मकानों को ताश के पत्तों की तरह उड़ा दिया।

अगले ही पल पाया कि हम सभी मलबे में बुरी तरह घिरे थे। शायद पानी की किसी लहर से मुझे उठाकर मंदिर के अंदर पटक दिया। मलबा तेज वेग से गर्भगृह तक गया, वापस लौटा और पश्चिमी दरवाजे को तोड़कर शहर की ओर बढ़ गया। मैंने दो-तीन बच्चों को मलबे में समाते देखा।

इस बीच मूसलाधार बरसात शुरू हो गई। जो जहां था, वहीं पर जड़ होकर रह गया। शाम करीब चार बजे पानी का वेग कुछ कम हुआ, मलबे में बहने से बचे लोग बाहर निकलने लगे।

कोई भी किसी की मदद करने स्थिति में नहीं था। मै मंदिर के अंदर कमर तक मलबे में दबा था। किसी तरह बाहर निकला तो मुंह से कराह भी नहीं निकल पाई। बाहर चारों ओर तबाही का ही नजारा था।

मंदिर में जिंदा बचे थे 1100 लोग

disaster story by kedarnth priest

कुछ और लोग एकत्र हुए तो हमने केदारनाथ से निकलने की कोशिश शुरू की। मंदाकिनी में रस्सा डालकर पार करने की कोशिश कामयाब नहीं हुई। भैरवमंदिर की ओर बीएसएनल के पास गए, टावर की जड़ से इतना पानी निकल रहा था कि पार करना असंभव था।

हम करीब 1100 लोग थे। भूख-प्यास से बेहाल और बुरी तरह से टूटे बदन के साथ ही अपनों को खो देने पीड़ा के बीच रात गुजारने की चुनौती सामने थी। हम मंदिर की ओर लौटे और सोमवार 17 जून की रात वहीं गुजारी।

18 जून मंगलवार सुबह पानी का वेग कम हुआ तो हमने गरुड़ चट्टी की राह पकड़ी। एक हेलीकॉप्टर दिखाई दिया। लेकिन यह न तो उतरा और न ही खाने का कोई सामान फेंका।

जिंदगी की जद्दोजहद के बीच किसी तरह से दोपहर बाद तक गरुड़चट्टी पहुंचे। 18 की शाम एक हेलीकाप्टर से मैं वहां से निकल पाया।

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