देहरादून: केरल में धर्मांतरण विवाद पर गंभीर दिखे राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, कही बड़ी बात
- कहा, मेट्रोमैन श्रीधरन किस आधार पर यह बात कह रहे हैं, वह काबिलेगौर
- राज्यपाल ने कहा, मैं अल्पसंख्यक नहीं बल्कि भारतीय नागरिक हूं
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मेट्रोमैन ई श्रीधरन के केरल में हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण के बयान को लेकर वहां के राज्यपाल भी गंभीर हैं। रविवार को देहरादून पहुंचे केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि, यह बात काबिलेगौर है कि ई श्रीधरन किस आधार पर यह आरोप लगा रहे हैं। वह लौटकर इस मामले की जानकारी लेंगे।
रविवार को राज्यसभा सांसद नरेश बंसल के आवास पर पहुंचे केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने अमर उजाला से विशेष बातचीत की। उन्होंने कहा कि केरल में हिंदू या ईसाई लड़कियों के धर्मांतरण पर अगर श्रीधरन कुछ आरोप लगा रहे हैं तो उनके पास इसका कुछ आधार होगा।
अल्पसंख्यकों की अनदेखी के सवाल पर राज्यपाल ने कहा कि यह ऐसा विषय है, जिस पर मैं भाजपा सहित किसी भी राजनीतिक पार्टी से सहमत नहीं होता। जब मैं भाजपा में था तो मुझे कहा गया कि अल्पसंख्यक मोर्चे की बैठक है तो मैंने कहा कि मैं तो हूं नहीं। जो अल्पसंख्यक है, वह बैठक में जाए। उन्होंने कहा कि यह मायने नहीं रखता कि आपका धर्म क्या है।
मौजूदा समय में मुस्लिम कानूनों की व्याख्या कुरआन सम्मत नहीं
राज्यपाल आरिफ मोहम्मद ने कहा कि जिस तरह भारत का कोई भी कानून संविधान सम्मत होना चाहिए, उसी तरह मुस्लिम कानून की व्याख्या भी कुरआन सम्मत होनी चाहिए। तमाम मुस्लिम कानून ऐसे हैं जिनकी कुरआन सम्मत व्याख्या नहीं होती। यह प्रवृत्ति पिछले पचास-साठ साल में बढ़ी है। मतलब कुरआन उनकी उस तरह से व्याख्या नहीं करता है, जैसा आज के आलिम करते हैं। उन्होंने कहा कि अपनी किताब में उन्होंने बाकायदा ऐसे कानूनों का जिक्र भी किया है।
विविधता भारतीयों की नस-नस में : आरिफ
दुनिया में आज से हजारों साल पहले इस विविधता में एकता की भावना को केवल भारतीय सभ्यता ने आत्मसात किया है। यह अकेले संविधान की देन नहीं है। संविधान, उन परंपराओं से प्रेरणा लेकर बनाया गया है। यहां हर कोई आजाद है, हम लोकतंत्र में हैं।
उन्होंने कहा कि आज छठ पर्व दिल्ली और उत्तराखंड में मनाया जाता है, इससे अच्छा उदाहरण और क्या होगा। हमारे तरीके भले अलग-अलग हैं लेकिन पहाड़ पर कहीं से भी चढ़ो, चोटी पर ही पहुंचोगे।
उन्होंने यह भी कहा कि हमारे भीतर वह क्षमता है कि हम दुनिया को एक नई राह दिखा सकते हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति नई नहीं है बल्कि यह वक्त के साथ परखी हुई सभ्यता है। इसके पीछे वजह यह है कि हम एकरूपता लाना नहीं चाहते।