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Dehradun News: सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के आरोप में ग्राम प्रधान पद के लिए अयोग्य घोषित
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देहरादून। ग्राम पंचायत गल्जवाड़ी की ग्राम प्रधान हरिकला पुन को सरकारी भूमि पर अनधिकृत कब्जे के मामले में अनर्ह (अयोग्य) घोषित कर दिया गया है।
विहित अधिकारी/उपजिलाधिकारी (न्यायिक), सदर की कोर्ट ने पूर्व लीला शर्मा की शिकायत स्वीकार करते हुए उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 की धारा 8(5) के तहत यह आदेश पारित किया। हरिकला को पिछले साल ग्राम प्रधान चुना गया था।
मामले में लीला शर्मा आरोप लगाया था कि हरिकला पुन ने सरकारी भूमि पर कब्जा कर घेरबाड़ और निर्माण किया था। चुनाव के वक्त भी यह कब्जा था और मतगणना के बाद तक जारी रहा। शिकायत के अनुसार यह जमीन 360 वर्गमीटर है, जो राजस्व अभिलेखों में सरकारी प्रकृति की भूमि के रूप में दर्ज है।
हरिकला पुन की ओर से आरोपों का विरोध करते हुए कहा गया कि सरकारी भूमि पर उनके कब्जे का कोई पर्याप्त प्रमाण नहीं है और चुनाव संबंधी आरोपों को कठोर साक्ष्य से सिद्ध किया जाना चाहिए। उन्होंने विभिन्न न्यायिक निर्णयों का भी हवाला दिया।
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हालांकि, अदालत ने राजस्व विभाग की जांच रिपोर्ट, खतौनी, राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट और अधिकारियों के बयानों को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। आदेश में उल्लेख है कि राजस्व निरीक्षक ने 23 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में संबंधित भूमि पर कब्जे की पुष्टि की थी। तहसीलदार की रिपोर्ट और बाद में राजस्व अधिकारियों द्वारा कब्जा हटाने की कार्रवाई को भी संज्ञान में लिया गया। सभी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने गत तीन सितंबर को यह आदेश दिया है।
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विहित अधिकारी/उपजिलाधिकारी (न्यायिक), सदर की कोर्ट ने पूर्व लीला शर्मा की शिकायत स्वीकार करते हुए उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 की धारा 8(5) के तहत यह आदेश पारित किया। हरिकला को पिछले साल ग्राम प्रधान चुना गया था।
मामले में लीला शर्मा आरोप लगाया था कि हरिकला पुन ने सरकारी भूमि पर कब्जा कर घेरबाड़ और निर्माण किया था। चुनाव के वक्त भी यह कब्जा था और मतगणना के बाद तक जारी रहा। शिकायत के अनुसार यह जमीन 360 वर्गमीटर है, जो राजस्व अभिलेखों में सरकारी प्रकृति की भूमि के रूप में दर्ज है।
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हरिकला पुन की ओर से आरोपों का विरोध करते हुए कहा गया कि सरकारी भूमि पर उनके कब्जे का कोई पर्याप्त प्रमाण नहीं है और चुनाव संबंधी आरोपों को कठोर साक्ष्य से सिद्ध किया जाना चाहिए। उन्होंने विभिन्न न्यायिक निर्णयों का भी हवाला दिया।
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हालांकि, अदालत ने राजस्व विभाग की जांच रिपोर्ट, खतौनी, राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट और अधिकारियों के बयानों को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। आदेश में उल्लेख है कि राजस्व निरीक्षक ने 23 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में संबंधित भूमि पर कब्जे की पुष्टि की थी। तहसीलदार की रिपोर्ट और बाद में राजस्व अधिकारियों द्वारा कब्जा हटाने की कार्रवाई को भी संज्ञान में लिया गया। सभी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने गत तीन सितंबर को यह आदेश दिया है।