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8 साल की बहन को देख भाई की नीयत हुई खराब, किया रेप

Sun, 05 Jul 2015 05:28 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, बागेश्वर
ब्यूरो / अमर उजाला, बागेश्वर Updated Sun, 05 Jul 2015 05:28 PM IST
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rapist brother got imprisonment.

उत्तराखंड में विशेष सत्र न्यायाधीश पॉक्सो/जिला जज डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने नाबालिग से बलात्कार करने वाले युवक को सात साल के कठोर कारावास और पांच हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है।

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अदालत ने इस तथ्य को छिपाने के लिए पीड़िता के माता-पिता को और इलाज नहीं करने के कारण एक डॉक्टर को कारण बताओ नोटिस दिया है।

बागेश्वर कोतवाली के अंतर्गत एक गांव में पिछले साल 25 अक्तूबर को एक युवक ने रिश्ते की आठ साल की बहन के साथ दुराचार कर दिया था। पीड़िता के माता-पिता उसे उपचार के लिए एक निजी अस्पताल में लाए। माता-पिता ने बलात्कार की बात छिपाते हुए इंफेक्शन होने का बहाना किया, लेकिन डॉक्टर ने इलाज से इनकार कर दिया।
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घटना के 47 दिन गुजर जाने के बाद बालिका के पिता ने बागेश्वर कोतवाली में जान से मारने की धमकी और दुराचार के आरोप में धारा 506, 376, 3/4 के तहत नामजद एफआईआर दर्ज कराई। बताया कि अल्मोड़ा के एक अस्पताल में उसका इलाज कराया। जांच के उपरांत पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

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डॉक्टर ने नहीं किया पीड़िता का इलाज

rapist brother got imprisonment.

यह मामला विशेष सत्र न्यायाधीश पॉक्सो/जिला जज डॉ. जीके शर्मा की अदालत में चला। शासकीय अधिवक्ता आबिद हसन ने इस मामले में उपलब्ध तथ्य पेश किए। हालांकि समय पर परीक्षण नहीं होने के कारण इस मामले के डॉक्टरी दस्तावेज नहीं थे।

23 जून को न्यायाधीश ने आरोपी पर धारा 376 और 3/4 पॉक्सो अधिनियम के तहत दोष सिद्ध किया और धारा 506 में उसे दोषमुक्त करार दिया। इसके बाद दो जुलाई को उन्होंने इस मामले की सुनवाई करते हुए अभियुक्त को सात साल के कठोर कारावास और पांच हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई।

न्यायालय ने इस प्रकरण में समय पर पुलिस को सूचना न देकर तथ्य छिपाने पर माता-पिता को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। बागेश्वर के डॉक्टर को इस बात के लिए नोटिस जारी किया गया है कि उसने पुलिस को सूचना नहीं दी और पीड़िता का इलाज भी नहीं किया।

पॉक्सो अधिनियम के अनुसार पुलिस को सूचना देने और पीड़िता का मुफ्त इलाज करने की जिम्मेदारी डॉक्टर की है। विशेष सत्र न्यायाधीश ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को निर्देश दिया है कि पीड़िता को मानसिक आघात से उबारने के लिए उसकी काउंसलिंग का इंतजाम करें।

डॉक्टरी प्रमाण पत्र नहीं होने मात्र से आरोपी दोषमुक्त नहीं हो सकता। एफआईआर में देरी भी उसके दोष मुक्त होने का आधार नहीं है। इस मामले में पीड़िता के बयान ही काफी हैं।
- डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा, बागेश्वर, विशेष सत्र न्यायाधीश पॉक्सो/जिला जज

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