'जहां पैसा है वहां क्राइम है', डीजीपी साहब तो यही कहते हैं...
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पुलिस महानिदेशक एमए गणपति ने कहा कि क्राइम का सिद्धांत है कि आर्थिक विकास के साथ अपराध भी बढ़ता है। सीधे शब्दों में कहें तो जहां पैसा है वहां क्राइम है। देहरादून और हरिद्वार में इसी वजह से आर्थिक अपराधों में बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने कहा कि पुलिस ऐसा महकमा है जहां काम करने का तरीका बदलना जरूरी है, वरना वह अपराधियों के साथ दौड़ में पीछे रह जाएगी। डीजीपी शुक्रवार को पुलिस लाइन में गढ़वाल रेंज के उप निरीक्षकों के चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का उद्घाटन कर अपने विचार रख रहे थे।
उन्होंने कहा कि अपराध का ट्रेंड बदल रहा है। अपहरण, डकैती जैसे अपराधों के बजाय साइबर फ्राड और जमीन धोखाधड़ी बढ़ी है। इस तरह के अपराधों की रोकथाम के साथ विवेचकों को कार्यशैली में बदलाव की जरूरत है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि बैंक लोन में फर्जीवाड़ा होता है तो पहले यह पता करें कि लोन की प्रक्रिया क्या है, ताकि यह साफ हो जाए कि नियम विरुद्ध क्या हुआ। ऐसे मामलों में विवेचना की गुणवत्ता बढ़ाकर सजा का प्रतिशत बढ़ाने के लिए यह कार्यशाला आयोजित की गई है।
पुलिस महानिरीक्षक संजय गुंज्याल ने कहा कि इसी क्रम में छह अगस्त को थाने के हेड मोहर्रिर और माल खाना प्रभारी, सात अगस्त को पैरोकारों और आठ अगस्त को कंट्रोल रूम के कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। देहरादून के एसएसपी डॉ. सदानंद दाते ने विवेचना में दस्तावेजी साक्ष्यों की अधिकता पर बल दिया।
गश्त में मामूर के ट्रेंड को अब छोड़ना होगा
सीबीआई के सहायक शासकीय अधिवक्ता अभिषेक अरोरा ने संपत्ति से जुड़े अपराधों में अभिलेखीय साक्ष्य संकलन, हस्तलेख, हस्ताक्षर मिलान, फोटो और वीडियोग्राफी, आवाज के मिलान से जुडे़ साक्ष्यों की जानकारी दी। सीबीआई के निरीक्षक अनिल चंदोला, एमएस मयाल, सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक वीके जुयाल, गिरीश चंद, एसपीओ विजिलेंस जीसी पंचोली, जेडीए जेएस बिष्ट इस दौरान मौजूद रहे। कार्यशाला में गढ़वाल रेंज के 280 दारोगाओं को अपराध के नए ट्रेंड और विवेचना में हुए बदलाव की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी।
पुलिस महानिरीक्षक संजय गुंज्याल ने कहा कि पुलिस लिखापढ़ी में गश्त में मामूर के पुराने ट्रेंड़ को अब छोड़ना होगा। पहले की विवेचनाओं में मौखिक साक्ष्यों का समावेश ज्यादा होेता था। ढूंढकर शब्दों का इस्तेमाल होता था। लेकिन पुलिस की पुरानी लिखापढ़ी के दिन अब लद गए है। अब दस्तावेजी और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर दोषियों को सजा दिलाना आसान हो गया है।