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उत्तराखंड कुटीर उद्योग: अब न काष्ठ रहा न कलाकार, स्मृति चिन्हों तक सिमटा हुनर

Tue, 26 Nov 2019 03:48 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Tue, 26 Nov 2019 03:48 PM IST
सार

  • काष्ठ कला को छोड़ कर कारीगर अपना रहे आजीविका के दूसरे साधन

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cottage industry wooden art in uttarakhand
- फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड के पहाड़ों में हर घर की शान बढ़ाने वाली काष्ठ कला अब स्मृति चिन्हों तक सिमट गई है। किसी जमाने में घर बनाने से लेकर घरेलू उपयोग में आने वाले लकड़ी के सामान में नक्काशी का प्रचलन था। लेकिन अब काष्ठ कला धीरे-धीरे लुप्त हो रही है।

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पहाड़ों में भी सीमेंट व कंकरीट के मकान बनने से गांवों में प्राचीन काष्ठ कला के नमूने देखने को मिलते हैं। मकान बनाने के लिए लकड़ी न मिलने से अब यह काष्ठ कला काम भी खत्म हो रहा है। इससे इस व्यवसाय से हस्तशिल्प भी आजीविका के लिए दूसरे साधन अपनाने को पलायन के लिए मजबूर हो रहे हैं।
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किसी जमाने में उत्तराखंड की काष्ठ शिल्प में एक अलग पहचान थी। गांवों में पुराने मकानों के दरवाजों, खिड़कियों पर आज भी प्राचीन काष्ठ कला ने अपनी छाप छोड़ी है। हस्तशिल्पियों के हाथों से लकड़ी पर उकेरी गई नक्काशी हर घर की शान होती थी। वहीं, लकड़ी से पाली, ठेकी, कुमैयां भदेल, नाली समेत अन्य प्रकार के बर्तनों को इस्तेमाल किया जाता है।
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वर्तमान में काष्ठ कला से जुड़े परिवारों के सामने भी रोजी रोटी का संकट हो गया है, जिससे वे अब दूसरे व्यवसाय को अपनाने के लिए पलायन करने को विवश हैं। काष्ठ कला के हस्तशिल्पियों का कहना है कि सरकार को इस प्राचीन हस्तशिल्प कला पर गंभीरता से ध्यान दिया देना चाहिए।

यह व्यवसाय को स्वरोजगार का बहुत बड़ा माध्यम बन सकता है। साथ ही केदारनाथ व चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को लकड़ी से बने मंदिरों के प्रतीक चिन्ह भेंट किए जा सकते हैं, जो लंबे समय तक यादगार तो रहेंगे। इससे स्थानीय स्तर पर कई परिवारों की आजीविका भी मजबूत होगी। 

बन सकता है रोजगार का बड़ा साधन

आड़ी-तिरछी सूखी लकड़ियों पर जीवन के रंग उकेर रहे अशोक चौधरी काष्ठ हस्तशिल्प को नया आयाम देने में जुटे हैं। दो दशक से वे सीमित संसाधनों में लकड़ी पर अनेकों कलाकृतियां उकेर चुके हैं, जिसमें आमजन के जीवन के संघर्ष से लेकर देवी-देवताओं की कृतियां प्रमुख हैं।

रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड हाईवे पर संगम बाजार में रहने वाले चौधरी का कहना है कि  वर्ष 1997 से सूखी लकड़ियों पर मावन जीवन को उकेरते आ रहे हैं। जहां भी सूखी लकड़ी मिलती है, वे उसे घर ले आते हैं और उसे नया स्वरूप देने में जुट जाते हैं। काष्ठ हस्तशिल्प को सरकार बढ़ावा देती है तो यह स्वरोजगार का बड़ा साधन बन सकता है। इससे पहाड़ों से हो रहा पलायन रुकेगा। 

हाशिए पर काष्ठ शिल्प


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल केदारनाथ में तीर्थ पुरोहितों के लिए बन रहे आवासीय भवनों के खिड़की-दरवाजे तैयार करने वाले जौनसार के हस्तशिल्प जयवीर, जगमोहन, राजेंद्र का कहना है कि एक दरवाजे को नक्काशी से तैयार करने में कम से कम छह दिन लगते हैं।

 

इस कार्य में पेंसिल की नोंक के बराबर की गलती पर पूरा दरवाजा या खिड़की खराब हो सकती है। कड़ी मेहनत से जो बना पा रहे हैं, उसे बाजार में उचित दाम नहीं मिल पा रहा है। सीमेंट व कंकरीट से बने मकानों ने काष्ठ कला को हाशिए पर पहुंचा दिया है। 
 

अब नहीं दिखते काष्ठ से निर्मित बर्तन


दशकों पहले कुमाऊं में काष्ठ (लकड़ी) से निर्मित बर्तनों का चलन था। राजी जनजाति के लोगों का ही बर्तन बनाने की परंपरागत कला आजीविका का मुख्य साधन था। इसके साथ ही पिथौरागढ,चंपावत, कनालीछीना, डीडीहाट में भी काष्ठ कला कई परिवारों का व्यवसाय था। लेकिन अब तक मशीनीकरण व तकनीकी ने काष्ठ के बर्तनों का घरेलू उपयोग समाप्त कर दिया है। 

मुरलीधर बनाते हैं केदारनाथ धाम का प्रतीक


काष्ठ कला में माहिर हस्तशिल्प पौड़ी जिले के मुरलीधर केदारनाथ धाम का प्रतीक बनाने में माहिर हैं। उनके हाथों से बनी केदारनाथ का प्रतीक से प्रधानमंत्री समेत कई माननीयों को सम्मानित किया जा चुका है। मुरलीधर बताते हैं कि केदारनाथ धाम का एक प्रतीक बनाने में कम से कम एक माह का समय लग जाता है। केदारनाथ के प्रतीक बनाने का आर्डर कभी कभार ही मिलता है। अब युवा पीढ़ी इस व्यवसाय में नहीं आ रही है। 
 

बंद पड़ा है पापड़ी काष्ठ कला केंद्र


काष्ठ कला के हस्तशिल्पियों को प्रशिक्षण देने के लिए श्रीनगर के पापड़ी में खुला काष्ठ कला केंद्र बंद पड़ा है। अब यहां पर न तो प्रशिक्षण दिया जाता और न ही काष्ठ कला को बढ़ावा देने के लिए कोई गतिविधियां चल रही है। यदि सरकार इस केंद्र का विस्तारीकरण कर शिल्पियों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दे तो लोगों को रोजगार मिल सकता है। 

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