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सहकारी बैंकों को मंजूर नहीं सरकार का शिकंजा

Thu, 27 Feb 2014 02:04 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 27 Feb 2014 02:04 PM IST
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cooperative banks not accept government grip

वैद्यानाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू न होता देख अब उत्तराखंड की वित्तीय सहकारी संस्थाएं दूसरे रूट से सरकार के शिकंजे से निकलने की तैयारी कर रही हैं।

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अंश पूंजी सरकार को वापस कर दी
करीब आधा दर्जन सहकारी संस्थाओं ने सरकारी अंश पूंजी सरकार को वापस कर दी है। बाकी संस्थाएं वापस करने की तैयारी कर रही हैं।

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इन्हें करना सिर्फ इतना है कि प्रबंध समिति की बैठक में प्रस्ताव पारित करना है और इस प्रस्ताव के मुताबिक संस्था में लगी अंश पूंजी को वापस कर देना है।

वित्तीय सहकारी संस्थाओं जैसे जिला सहकारी बैंक, विशेष समितियां, पैक्स आदि लंबे समय से वैद्यनाथन समिति की संस्तुतियों के लागू होने का इंतजार कर रही हैं।
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समिति की सिफारिशों में स्पष्ट किया गया है कि ये संस्थाएं पूरी तरह से स्वायत्त होंगी और इन पर निबंधक या सहकारी विभाग का नियंत्रण नहीं होगा। पर 2006 में केंद्र से एमओयू होने के बाद भी प्रदेश में वैद्यनाथन कमेटी की संस्तुतियां लागू नहीं हुई।

एक्ट कमेटी ही अस्तित्व में नहीं
हद तो यह है कि केंद्र ने पिछले साल ही सहकारिता का केंद्रीय अधिनियम लागू किया था और इस अधिनियम के हिसाब से राज्यों को भी अपने अधिनियम में संशोधन करना है। पर प्रदेश में अभी तक एक्ट कमेटी ही अस्तित्व में नहीं आ पाई है।

ऐसे में अब प्रदेश की सहकारी समितियों ने विभागीय नियंत्रण से मुक्त होने का एक दूसरा रास्ता निकाला है। इन संस्थाओं ने संस्था में लगी अंशपंजी वापस करनी शुरू कर दी है।


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फिलहाल जिला सहकारी बैंक देहरादून, जिला सहकारी बैंक उधमसिंहनगर, जिला सहकारी बैंक नैनीताल आदि सरकारी अंश पूंजी वापस कर चुके हैं। बाकी की संस्थाएं भी छह माह में अंश पूंजी वापस करने की तैयारी में हैं।

ये संस्थाएं स्वायत्त अधिनियम के तहत पंजीकृत होकर सरकार नियंत्रण से मुक्त होकर काम कर सकती है।

क्यों पड़ रही है जरूरत
सहकारी संस्थाओं के प्रतिनिधियों के मुताबिक सहकारिता विभाग के अफसर कई मामलों में संस्थाओं केप्रबंध बोर्ड के फैसलों को उलट देने तक का दबाव बनाते हैं।

हाल यह हुआ था कि राज्य सहकारी बैंक के गठन के समय निबंधक के आदेश पर सभी जिला सहकारी बैंकों ने राज्य सहकारी बैंक में पैसा लगाया था। कहा यह गया था कि राज्य सहकारी बैंक जिला बैंकों को 20 प्रतिशत डीविडेंट देगा।

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पर लंबे समय तक यह मामला अटका रहा। बैंकों के कम्प्यूटराइजेशन में यह मामला साफ उभर कर आया। बैंक अपने पैसे से कम्प्यूटराइजेशन कराने के लिए तैयार थे पर इस मामले को हल होने में दस साल लगे।

यही हाल बैंकों में नियुक्तियों का है। अधिकतर बैंक स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं पर नियुक्तियां नहीं कर पा रहे हैं। एक पदाधिकारी के मुताबिक जब आरबीआई और नाबार्ड नियंत्रक हैं ही तो बैंकों पर सरकार के नियंत्रण की जरूरत ही क्या है।

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