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उत्तराखंड में ‘जिताऊ चेहरे’ के फॉर्मूले से नहीं डिगी भाजपा
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 19 Mar 2017 12:39 PM IST
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trivendra singh rawat
- फोटो : amar ujala
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बंपर बहुमत के बाद भी भाजपा ने अपना ‘जिताऊ चेहरे’ का फार्मूला मंत्रिमंडल चयन में भी नहीं बदला है। कांग्रेस के दिग्गजों को तोड़ कर भाजपा ने अपना कुनबा मजबूत करने की मुहिम एक वर्ष पहले शुरू की थी, जो मंत्रिमंडल में शामिल चेहरों में भी दिखी।
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केंद्रीय लीडरशिप ने 57 सीटों पर जीतने के बाद उन कयासों को भी विराम दे दिया कि बागियों की जगह मंत्रिमंडल में ‘अपनों’ को तरजीह मिलेगी। सियासी रणनीतिकार इसे टीम शाह की सोची समझी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। भाजपा को जिताऊ चेहरों की तलाश भविष्य में कई अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में पड़ेगी, जहां भाजपा फिलहाल कमजोर स्थिति में है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव सिर पर हैं। अगर बागियों की मंत्रिमंडल में अनदेखी होती तो भविष्य में भाजपा में अन्य दलों से दिग्गजों को जोड़ने की मुहिम प्रभावित हो सकती है।
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भाजपा ने जिताऊ चेहरों की तलाश उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शुरू कर दी थी। शुरूआत 18 मार्च 2016 को एक झटके में कांग्रेस के नौ दिग्गज विधायकों को अपने पाले में शामिल कर की। भले ही उस समय भाजपा का यह दांव सफल नहीं हुआ, लेकिन उसके अब नतीजे दिख रहे हैं।
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टिकट आवंटन के समय प्रदेश संगठन की तमाम सिफारिशों के बावजूद 10 बागी विधायकों को टिकट मिले। पार्टी के इंटरनल सर्वे में जो बागी हारे माने जा रहे थे उनको भी टिकट दिया गया। आखिरी समय पर यशपाल आर्य को बेटे संजीव सहित पार्टी में शामिल करवा दोनों को टिकट दिया गया। जिससे पार्टी को परिवारवाद और तोड़फोड़ के लिए आलोचना तक झेलनी पड़ी। चार सिटिंग विधायकों महावीर रांगड, विजय बड़थ्वाल, तीरथ सिंह रावत, चंद्रशेखर का टिकट काटने से पार्टी नहीं हिचकी। टीम शाह के इस दांवपेंच से पार्टी के कई पुराने चेहरे नाराज हो गए।
आधा दर्जन पूर्व विधायकों सहित डेढ़ दर्जन टिकट के दावेदारों ने पार्टी तक छोड़ दी। इतना ही नहीं पार्टी को 21 सीटों पर कांग्रेस के साथ टिकट कटने से नाराज दावेदारों से भिड़ना पड़ा। टिकट आवंटन के बाद भी बागियों की अगुवाई कर रहे पूर्व सीएम विजय बहुगुणा की सलाह केंद्रीय लीडरशिप ने मानी, जिससे कई दिग्गज कांग्रेसी भाजपा से आ जुड़े। टिकट कटने से अपने हुए बागियों की जगह बागियों के भरोसे कांग्रेस में हुई टूट फूट का फायदा भाजपा को चुनाव में मिला।
57 सीटों पर जीत हासिल करने के बाद पार्टी में चर्चा तेज हो गई कि मोदी लहर में मिली जीत में बागियों का कोई योगदान नहीं है। यह भी कयास लगने लगे कि बागियों से इक्का दुक्का को मंत्रिमंडल में लिया जाएगा, लेकिन हुआ ठीक उलट। शनिवार को जिन नौ मंत्रियों को शपथ दिलाई उसमें पांच कांग्रेस से आए नेता थे। वर्ष 2007 से 2012 के बीच दो मंत्री थे उसमें से त्रिवेंद्र रावत मंत्रिमंडल में केवल प्रकाश पंत और मदन कौशिक जगह बना पाए।
पार्टी ने यह दांव सभी प्रदेशों में भाजपा की सरकार बनाने की मुहिम के तहत खेला है। सतपाल महाराज, हरक सिंह रावत और यशपाल आर्य के साथ सुबोध उनियाल और एक मात्र महिला चेहरा रेखा आर्य को भी रणनीति के तहत मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। सियासी रणनीतिकार मान रहे हैं कि भाजपा ने यह संकेत दिया है कि उनसे जुड़ने वालों की अनदेखी नहीं होगी। इस वर्ष गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव हैं, जहां पार्टी अपना जिताऊ चेहरे फार्मूला दोहरा सकती है। हालांकि यह भी साफ है कि बागी मंत्री बन गए, लेकिन जो स्वतंत्रता उन्होंने कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भोगी, वैसी भाजपा में न मिले।