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...तो इस महा पराजय को पचा नहीं पा रही कांग्रेस
राकेश खंडूड़ी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 14 Mar 2017 10:13 AM IST
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विधानसभा चुनाव में इतिहास की सबसे बड़ी पराजय से स्तब्ध कांग्रेस अपनी कमजोरियों में झांकने को शायद तैयार नहीं है। उसे अब भी लग रहा है कि वह चुनाव जीतने की स्थिति में थी, मगर कुछ ऐसी कहानी बनी कि वह चारों खाने चित हो गई।
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उसके शीर्ष नेताओं ने जिस तरह से चुनाव में इस्तेमाल हुई इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं, वे जाहिर कर रहे हैं कि पार्टी अतीत में की गई भूलों से सबक लेने को तैयार नहीं है। जबकि चुनाव परिणाम आने से कुछ दिन पहले ही एक बैठक में पार्टी प्रत्याशियों ने संभावित प्रदर्शन की मोटी-मोटी तस्वीर प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के सामने रख दी थी।
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बहरहाल, यूपी पराजय से विचलित बसपा सुप्रीमो मायावती के ईवीएम पर उठाए गए सवाल को कांग्रेस ने लपक लिया है। वह इसे अपनी आगे की सियासत का हथियार बनाने की फिराक में नजर आ रही है। हालांकि ठोस आधार के अभाव में वह खुलकर आवाज उठाने से बच रही है। मगर उसके इरादे इस मुद्दे के बहाने बड़े सवाल उठाने के हैं। इस मुद्दे पर इशारों में कार्यवाह सीएम हरीश रावत कहते हैं, ‘हमने कोई सवाल नहीं उठाया है।
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एक राजनीतिक दल के प्रमुख नेता ने सवाल किया। जब एक सवाल उठा है तो उसका हल निकलना चाहिए। हल पारदर्शी वोटिंग प्रणाली के हक में निकलना चाहिए।’ उधर, प्रदेश कांग्रेस ने ईवीएम को लेकर मुख्य निर्वाचन अधिकारी को एक ज्ञापन दिया। पत्र में ईवीएम में छेड़छाड़ को लेकर आशंका जताई गई। कहा गया कि यूपी में दो राष्ट्रीय दलों ने विस चुनाव में ईवीएम में छेड़छाड़ को लेकर सवाल उठाए हैं। इन शंकाओं का समाधान होना चाहिए।
तब तक सभी ईवीएम कस्टडी में रखी जाएं। स्पष्टत: कांग्रेस को भी अपनी पराजय में ईवीएम की माया नजर आ रही है। मगर सियासी जानकार कांग्रेस के इस रुख को हार के मूल कारणों से मुंह फेरने की कवायद मान रहे हैं। चूंकि चुनाव में पार्टी का तकरीबन पूरे नेतृत्व का सफाया हो गया है, लिहाजा सभी एक सुर ताल में ईवीएम पर ठीकरा फोड़ने में जुट गए हैं।
सीईओ का ज्ञापन सौंपा
पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष जोत सिंह बिष्ट, मुख्य प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी, राजेन्द्र भंडारी, राजेंद्र शाह, ताहिर अली, कै. (सेनि)बलबीर सिंह, गरिमा दसौनी ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर ईवीएम से छेड़छाड़ को लेकर उठे सवाल की समाधान करने और निर्णय आने तक चुनाव में इस्तेमाल सभी ईवीएम को कस्टडी में रखने की मांग की।
जवाब मिलेंगे, गिरेबां में झांके तो सही
जानकारों की मानें तो कांग्रेस गिरेबां में झांके तो उसे अपनी इस सबसे बड़ी पराजय को लेकर उठे सवालों के जवाब मिल जाएंगे। पहला सवाल कि क्या हार के लिए कांग्रेस का अड़ियल नेतृत्व गुनाहगार नहीं है? क्या संगठन और सरकार के रिश्तों की खटास ने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ने का काम नहीं किया? क्या प्रदेश नेतृत्व ने कमजोर आलाकमान का फायदा उठाते हुए मनमानी नहीं करनी चाही? क्या मुख्यमंत्री ने उस घेरे से बाहर निकलने की कभी कोशिश की जिसने उन्हें जमीनी हकीकत से दूर रखा और सरकार की गुलाबी तस्वीरें दिखाकर गुमराह करने की कोशिश की? चुनाव प्रचार की कमान एक कैम्पेन कंपनी पर छोड़ कर क्या पार्टी कार्यकर्ताओं को भरोसा नहीं तोड़ा गया? ऐसे तमाम सवाल हैं जिनके हल जानने के बजाय पार्टी ईवीएम पर सवाल उठाकर सियासत के फिर उसी शार्टकट पर है जिसकी वजह से उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा है।
शून्य से भी कम घटा कांग्रेस वोट बैंक
कांग्रेस बेशक ईवीएम को लेकर शंका जता रही है मगर गौर करने वाली बात यह है कि इस चुनाव में उसके वोट बैंक में शून्य से कम गिरावट दर्ज हुई है। ये बात और है कि सीटों के मामले में उसे भारी नुकसान झेलना पड़ा है। वर्ष 2012 में कांग्रेस ने 33.79 फीसदी वोट के साथ 32 सीटें जीती थी। इस चुनाव में उसका वोट प्रतिशत 33.50 फीसदी रहा। यानी 0.29 फीसदी ही कम हुआ। मगर सीटें सिमटकर 11 रह गईं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भाजपा ने अन्य वोट बैंक पर सेंध लगाई। पिछले चुनाव की तुलना में उसने 13.37 फीसदी अतिरिक्त वोट हासिल किए, वह उसने अन्यों के हिस्से से हासिल किया। इसमें उसकी आक्रामक प्रचार की बड़ी भूमिका रही, जबकि कांग्रेस अपने सांगठनिक नेवटर्क को प्रचार से जोड़ पाने में नाकाम रही, जिससे उसे अन्यों के वोट साधने में नाकामी मिली।