PCC चीफ प्रीतम के सामने चुनौतियों का पहाड़, कांग्रेस को है उनसे ये उम्मीद
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प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह के सामने चुनौतियों का पहाड़ है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पूरी पार्टी का मनोबल टूटा हुआ है। पिछले तीन साल के भीतर कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके हैं।
ऐसे हालातों में प्रीतम के सामने न सिर्फ पार्टी का मनोबल ऊंचा करने की चुनौती है, बल्कि उन्हें कांग्रेस का खोया जनाधार पर भी वापस लाना है। सांगठनिक चुनाव का कार्यक्रम जारी हो जाने के बाद संगठन में नए प्रयोग करने की बहुत ज्यादा गुंजाइश भी नहीं है।
सियासी हवाओं में यह प्रश्न तैर रहा है कि क्या प्रीतम पस्त पड़ी कांग्रेस में नई जान फूंक पाएंगे? उनकी क्षमता, व्यक्तित्व और अनुभव की खूबी के मजबूत और कमजोर दोनों ही पक्ष हैं, जिनके रहते उन्हें चुनौतियों का पहाड़ लांघना है।
मजबूती: बेदाग छवि, कद्दावर नेता
प्रदेश की राजनीति में प्रीतम सिंह बेदाग छवि के नेता माने जाते हैं। वह सरल स्वभाव के मृदभाषी नेता हैं। लेकिन इससे अधिक मजबूत पक्ष उनका राजनीतिक कौशल है। राज्य गठन के बाद से वह लगातार चार बार विधायक चुने गए। थोड़े समय के लिए भाजपा में रहने के बाद वह कांग्रेस के साथ जुड़े तो फिर उनका ये रिश्ता अब तक अटूट रहा है। राजनीतिक दमखम से उन्होंने चकराता सीट पर मोदी लहर को नाकाम कर कांग्रेस आलाकमान को मुग्ध किया। हरीश रावत के नजदीक होने के बावजूद वह कभी गुटबाजी में नहीं फंसे। पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं से वह समन्वय बनाकर चले हैं।
कमजोरी: प्रदेश स्तरीय नेता की छवि का अभाव
मगर तमाम खूबियों के बावजूद प्रीतम सिंह की कुछ कमजोरियां भी रही हैं, जो सांगठनिक चुनौतियों से निपटने में उनके लिये मुश्किल पैदा कर सकती हैं। वह कई बार विधायक तो रहे मगर संगठन की जिम्मेदारी निभाने का उन्हें अवसर नहीं मिला। लगातार चुनाव जीतने और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने के बावजूद प्रीतम सिंह प्रदेश स्तरीय नेता की छवि बनाने में नाकाम रहे हैं।
उनकी विधानसभा चकराता जहां उनका मजबूत पक्ष है तो वही उनकी कमजोरी रहा, क्योंकि पूरे राजनीतिक जीवन में उनका पूरा फोकस अपनी विधानसभा पर ही रहा है। कांग्रेस सरकार में उन पर ये आरोप लगते रहे कि वह चकराता के कैबिनेट मंत्री हैं। लेकिन अब प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते उन पर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी है। संगठन को खड़ा करने के साथ प्रदेशस्तरीय नेता की छवि बनाने की चुनौती का सामना करना है।
साथियों से बेहतर ट्यूनिंग की पार्टी को आस
कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह से पार्टी हाईकमान को ये उम्मीद है कि वे साथियों के साथ बेहतर ट्यूनिंग बनाकर चलने में सफल रहेंगे। खास तौर पर नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश के साथ कदमताल करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी।
पार्टी हाईकमान के इस विश्वास की दरअसल कई वजह है। एक, प्रीतम सिंह की ये खूबी रही है कि भले ही तमाम पदों के लिए समय-समय पर उनकी दावेदारी उभरी हो, लेकिन वे कांग्रेस की गुटीय राजनीति का कभी हिस्सा नहीं बने।
उन्होंने किसी गुट में फंसने से खुद को बचाने की भरसक कोशिश की और सफल भी रहे। इसके अलावा, उनके साथ डा. इंदिरा हृदयेश के शुरू से ठीक-ठीक संबंध रहे हैं। दोनों के बीच ऐसा कभी नहीं रहा कि किसी बात पर तलवारें खिंची हों।
इंदिरा को भी हाल ही में नेता प्रतिपक्ष की नई-नई जिम्मेदारी मिली है। उनकी कोशिश भी ये ही है कि वे अपनी नई भूमिका में सफल साबित होकर दिखाएं। एक हिसाब से कह सकते हैं, कि नई भूमिका में खुद को स्थापित करने के लिए इंदिरा अभी संघर्ष की स्थिति में है।
प्रीतम की कोशिश भी खुद को नई भूमिका के हिसाब से तैयार करने की होगी। ऐसे में माना जा रहा है कि प्रीतम सिंह के साथ उनके राजनीतिक हितों के हाल-फिलहाल टकराव की सूरत नहीं है।
वैसे, ये जरूर रहा है कि प्रीतम सिंह अपने क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के अलावा दूसरे जिलों के कार्यकर्ताओं के साथ बहुत ज्यादा घुलने-मिलने वाले नहीं रहे हैं। मंत्री रहते हुए भी उनकी राजनीति ज्यादातर जौनसार के इर्द-गिर्द सिमटी रही है। पार्टी के नेताओं को उम्मीद है कि नई जिम्मेदारी मिलने पर जाहिर तौर पर उनका दायरा भी बढे़गा और वे आसानी से सारी चीजों को मैनेज कर लेंगे।